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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत।
जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत॥१२२॥
जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत॥१२२॥
रघुकुलरूपी कमल के खिलाने वाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार मार्ग के लोगों को सुख देते हुए सीताजी और लक्ष्मणजीसहित वनको देखते हुए चले जा रहे हैं॥१२२॥
आगें रामु लखनु बने पाछे।
तापस बेष बिराजत काछे।
उभय बीच सिय सोहति कैसें।
ब्रह्म जीव बिच माया जैसें॥
तापस बेष बिराजत काछे।
उभय बीच सिय सोहति कैसें।
ब्रह्म जीव बिच माया जैसें॥
आगे श्रीरामजी हैं, पीछे लक्ष्मणजी सुशोभित हैं। तपस्वियों के वेष बनाये दोनों बड़ी ही शोभा पा रहे हैं। दोनों के बीच में सीताजी कैसी सुशोभित हो रही हैं, जैसे ब्रह्म और जीव के बीच में माया!॥१॥
बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई।
जनु मधु मदन मध्य रति लसई॥
उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही।
जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।
जनु मधु मदन मध्य रति लसई॥
उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही।
जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।
फिर जैसी छबि मेरे मन में बस रही है, उसको कहता हूँ--मानो वसन्त ऋतु और कामदेव के बीच में रति (कामदेव की स्त्री) शोभित हो। फिर अपने हृदय में खोज कर उपमा कहता हूँ कि मानो बुध (चन्द्रमाके पुत्र) और चन्द्रमा के बीच में रोहिणी (चन्द्रमा की स्त्री) सोह रही हो।॥ २॥
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता।
धरति चरन मग चलति सभीता।
सीय राम पद अंक बराएँ।
लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ।
धरति चरन मग चलति सभीता।
सीय राम पद अंक बराएँ।
लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ।
प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके [जमीनपर अङ्कित होनेवाले दोनों] चरणचिह्नोंके बीच-बीचमें पैर रखती हुई सीताजी [कहीं भगवान्के चरण चिह्नों पर पैर न टिक जाय इस बात से] डरती हुई मार्ग में चल रही हैं, और लक्ष्मणजी [मर्यादा की रक्षा के लिये] सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी दोनोंके चरणचिह्नोंको बचाते हुए उन्हें दाहिने रखकर रास्ता चल रहे हैं॥ ३॥
राम लखन सिय प्रीति सुहाई।
बचन अगोचर किमि कहि जाई॥
खग मृग मगन देखि छबि होही।
लिए चोरि चित राम बटोहीं॥
बचन अगोचर किमि कहि जाई॥
खग मृग मगन देखि छबि होही।
लिए चोरि चित राम बटोहीं॥
श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी की सुन्दर प्रीति वाणी का विषय नहीं है (अर्थात् अनिर्वचनीय है), अत: वह कैसे कही जा सकती है? पक्षी और पशु भी उस छविको देखकर (प्रेमानन्द में) मग्न हो जाते हैं। पथिकरूप श्रीरामचन्द्रजी ने उनके भी चित्त चुरा लिये हैं॥४॥
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