रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।
उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु॥१६९॥


[वसिष्ठजीने कहा-] हे तात! हृदय में धीरज धरो और आज जिस कार्य के करने का अवसर है, उसे करो। गुरुजी के वचन सुनकर भरतजी उठे और उन्होंने सब तैयारी करनेके लिये कहा॥ १६९॥

नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा।
परम बिचित्र बिमानु बनावा।
गहि पद भरत मातु सब राखी।
रहीं रानि दरसन अभिलाषी॥


वेदों में बतायी हुई विधि से राजा की देहको स्नान कराया गया और परम विचित्र विमान बनाया गया। भरतजी ने सब माताओं को चरण पकड़कर रखा (अर्थात् प्रार्थना करके उनको सती होनेसे रोक लिया)। वे रानियाँ भी [श्रीरामके] दर्शन की अभिलाषा से रह गयीं॥१॥

चंदन अगर भार बहु आए।
अमित अनेक सुगंध सुहाए।
सरजु तीर रचि चिता बनाई।
जनु सुरपुर सोपान सुहाई॥


चन्दन और अगर के तथा और भी अनेकों प्रकार के अपार [कपूर, गुग्गुल, केसर आदि] सुगन्ध-द्रव्यों के बहुत-से बोझ आये। सरयूजी के तटपर सुन्दर चिता रचकर बनायी गयी, [जो ऐसी मालूम होती थी] मानो स्वर्ग की सुन्दर सीढ़ी हो॥२॥

एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही।
बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही॥
सोधि सुमृति सब बेद पुराना।
कीन्ह भरत दसगात बिधाना॥


इस प्रकार सब दाहक्रिया की गयी और सबने विधिपूर्वक स्नान करके तिलाञ्जलि दी। फिर वेद, स्मृति और पुराण सबका मत निश्चय करके उसके अनुसार भरतजी ने पिता का दशगात्र-विधान (दस दिनोंके कृत्य) किया॥३॥

जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा।
तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा॥
भए बिसुद्ध दिए सब दाना।
धेनु बाजि गज बाहन नाना॥


मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी ने जहाँ जैसी आज्ञा दी, वहाँ भरत जी ने सब वैसा ही हजारों प्रकार से किया। शुद्ध हो जानेपर [विधिपूर्वक] सब दान दिये। गौएँ तथा घोड़े, हाथी आदि अनेक प्रकार की सवारियाँ,॥४॥

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