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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०-- संपति चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार ॥२१५॥
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार ॥२१५॥
सम्पत्ति (भोग-विलासकी सामग्री) चकवी है और भरतजी चकवा हैं और मुनिकी आज्ञा खेल
है, जिसने उस रातको आश्रमरूपी पिंजड़ेमें दोनोंको बंद कर रखा और ऐसे ही सबेरा
हो गया। [जैसे किसी बहेलियेके द्वारा एक पिंजड़े में रखे जानेपर भी चकवी चकवेका
रातको संयोग नहीं होता, वैसे ही भरद्वाजजीकी आज्ञासे रातभर भोग-- सामग्रियों के
साथ रहनेपर भी भरतजीने मनसे भी उनका स्पर्शतक नहीं किया।] ॥ २१५।।
मासपारायण, उन्नीसवाँ विश्राम
कीन्ह निमजनु तीरथराजा।
नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा॥
रिषि आयसु असीस सिर राखी।
करि दंडवत बिनय बहु भाषी॥
नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा॥
रिषि आयसु असीस सिर राखी।
करि दंडवत बिनय बहु भाषी॥
[प्रात:काल] भरतजीने तीर्थराजमें स्नान किया और समाजसहित मुनिको सिर नवाकर और
ऋषिकी आज्ञा तथा आशीर्वादको सिर चढ़ाकर दण्डवत् करके बहुत विनती की॥१॥
पथ गति कुसल साथ सब लीन्हें।
चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें।
रामसखा कर दीन्हें लागू।
चलत देह धरि जनु अनुरागू॥
चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें।
रामसखा कर दीन्हें लागू।
चलत देह धरि जनु अनुरागू॥
तदनन्तर रास्तेकी पहचान रखनेवाले लोगों (कुशल पथप्रदर्शकों) के साथ सब लोगोंको
लिये हुए भरतजी चित्रकूटमें चित्त लगाये चले। भरतजी रामसखा गुहके हाथमें हाथ
दिये हुए ऐसे जा रहे हैं, मानो साक्षात् प्रेम ही शरीर धारण किये हुए हो॥२॥
नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया।
पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया।
लखन राम सिय पंथ कहानी।
पूँछत सखहि कहत मृदु बानी।
पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया।
लखन राम सिय पंथ कहानी।
पूँछत सखहि कहत मृदु बानी।
न तो उनके पैरोंमें जूते हैं और न सिरपर छाया है। उनका प्रेम. नियम, व्रत और
धर्म निष्कपट (सच्चा) है। वे सखा निषादराजसे लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और
सीताजीके रास्तेकी बातें पूछते हैं, और वह कोमल वाणीसे कहता है ॥ ३ ॥
राम बास थल बिटप बिलोकें।
उर अनुराग रहत नहिं रोकें।
देखि दसा सुर बरिसहिं फूला।
भइ मृदु महि मगु मंगल मूला।
उर अनुराग रहत नहिं रोकें।
देखि दसा सुर बरिसहिं फूला।
भइ मृदु महि मगु मंगल मूला।
श्रीरामचन्द्रजी के ठहरने की जगहों और वृक्षों को देखकर उनके हृदय में प्रेम
रोके नहीं रुकता। भरतजी की यह दशा देखकर देवता फूल बरसाने लगे। पृथ्वी कोमल हो
गयी और मार्ग मङ्गल का मूल बन गया॥४॥
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