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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।
कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु॥२२५।।
कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु॥२२५।।
भरतजीका उस समय जैसा प्रेम था, वैसा शेषजी भी नहीं कह सकते। कविके लिये तो वह
वैसा ही अगम है जैसा अहंता और ममतासे मलिन मनुष्योंके लिये ब्रह्मानन्द!॥ २२५॥
सकल सनेह सिथिल रघुबर के।
गए कोस दुइ दिनकर ढरकें॥
जलु थलु देखि बसे निसि बीतें।
कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें॥
गए कोस दुइ दिनकर ढरकें॥
जलु थलु देखि बसे निसि बीतें।
कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें॥
सब लोग श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमके मारे शिथिल होनेके कारण सूर्यास्त होनेतक
(दिनभरमें) दो ही कोस चल पाये और जल-स्थलका सुपास देखकर रातको वहीं [बिना
खाये-पीये ही] रह गये। रात बीतनेपर श्रीरघुनाथजीके प्रेमी भरतजीने आगे गमन
किया।।१॥
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