रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड


भेंटी रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु।
अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु॥२४४॥


फिर श्रीरघुनाथजी सब माताओंसे मिले। उन्होंने सबको समझा-बुझाकर सन्तोष कराया कि हे माता ! जगत् ईश्वरके अधीन है, किसीको भी दोष नहीं देना चाहिये॥ २४४॥

गुरतिय पद बंदे दुहु भाई।
सहित बिप्रतिय जे सँग आईं।
गंग गौरि सम सब सनमानीं।
देहिं असीस मुदित मृदु बानी।।


फिर दोनों भाइयोंने ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंसहित-जो भरतजीकेसाथ आयी थीं, गुरुजीकी पत्नी अरुन्धतीजीके चरणोंकी वन्दना की और उन सबका गङ्गाजी तथा गौरीजीके समान सम्मान किया। वे सब आनन्दित होकर कोमल वाणीसे आशीर्वाद देने लगीं ॥१॥

गहि पद लगे सुमित्रा अंका।
जनु भेंटी संपति अति रंका॥
पुनि जननी चरननि दोउ भ्राता।
परे पेम ब्याकुल सब गाता॥


तब दोनों भाई पैर पकड़कर सुमित्राजीकी गोदमें जा चिपटे। मानो किसी अत्यन्त दरिद्रको सम्पत्तिसे भेंट हो गयी हो। फिर दोनों भाई माता कौसल्याजीके चरणोंमें गिर पड़े। प्रेमके मारे उनके सारे अंग शिथिल हैं ॥२॥

अति अनुराग अंब उर लाए।
नयन सनेह सलिल अन्हवाए।
तेहि अवसर कर हरष बिषादू।
किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू॥


बड़े ही स्नेहसे माताने उन्हें हृदयसे लगा लिया और नेत्रोंसे बहे हुए प्रेमाश्रुओंके जलसे उन्हें नहला दिया। उस समयके हर्ष और विषादको कवि कैसे कहे ? जैसे गूंगा स्वादको कैसे बतावे? ॥३॥

मिलि जननिहि सानुज रघुराऊ।
गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ।
पुरजन पाइ मुनीस नियोगू।
जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू॥


श्रीरघुनाथजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित माता कौसल्यासे मिलकर गुरुसे कहा कि आश्रमपर पधारिये। तदनन्तर मुनीश्वर वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर अयोध्यावासी सब लोग जल और थलका सुभीता देख-देखकर उतर गये ॥४॥

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