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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह।
श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह ॥२४७॥
श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह ॥२४७॥
दूसरे दिन सबेरा होनेपर मुनि वसिष्ठजीने श्रीरघुनाथजीको जो-जो आज्ञा दी, वह सब
कार्य प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने श्रद्धा-भक्तिसहित आदरके साथ किया ॥ २४७॥
करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी।
भे पुनीत पातक तम तरनी॥
जासु नाम पावक अघ तूला।
सुमिरत सकल सुमंगल मूला॥
वेदोंमें जैसा कहा गया है, उसीके अनुसार पिता की क्रिया करके, पापरूपी
अन्धकारके नष्ट करनेवाले सूर्यरूप श्रीरामचन्द्रजी शुद्ध हुए ! जिनका नाम
पापरूपी रूई के [तुरंत जला डालनेके] लिये अग्नि है; और जिनका स्मरणमात्र समस्त
शुभ मङ्गलोंका मूल है, ॥१॥
सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस।
तीरथ आवाहन सुरसरि जस॥
सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते।
बोले गुर सन राम पिरीते॥
तीरथ आवाहन सुरसरि जस॥
सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते।
बोले गुर सन राम पिरीते॥
वे [नित्य शुद्ध-बुद्ध] भगवान् श्रीरामजी शुद्ध हुए! साधुओंकी ऐसी सम्मति है कि
उनका शुद्ध होना वैसे ही है जैसा तीर्थों के आवाहनसे गङ्गाजी शुद्ध होती हैं!
(गङ्गाजी तो स्वभावसे ही शुद्ध हैं, उनमें जिन तीर्थोंका आवाहन किया जाता है
उलटे वे ही गङ्गाजीके सम्पर्कमें आनेसे शुद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार
सच्चिदानन्दरूप श्रीराम तो नित्य शुद्ध हैं, उनके संसर्गसे कर्म ही शुद्ध हो
गये।) जब शुद्ध हुए दो दिन बीत गये तब श्रीरामचन्द्रजी प्रीतिके साथ गुरुजीसे
बोले- ॥२॥
नाथ लोग सब निपट दुखारी।
कंद मूल फल अंबु अहारी॥
सानुज भरतु सचिव सब माता।
देखि मोहि पल जिमि जुग जाता।
कंद मूल फल अंबु अहारी॥
सानुज भरतु सचिव सब माता।
देखि मोहि पल जिमि जुग जाता।
हे नाथ! सब लोग यहाँ अत्यन्त दु:खी हो रहे हैं। कन्द, मूल, फल और जलका ही आहार
करते हैं। भाई शत्रुघ्नसहित भरतको, मन्त्रियोंको और सब माताओंको देखकर मुझे
एक-एक पल युगके समान बीत रहा है ॥ ३ ॥
सब समेत पुर धारिअ पाऊ।
आपु इहाँ अमरावति राऊ॥
बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई।
उचित होइ तस करिअ गोसाँई॥
आपु इहाँ अमरावति राऊ॥
बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई।
उचित होइ तस करिअ गोसाँई॥
अतः सबके साथ आप अयोध्यापुरीको पधारिये (लौट जाइये)। आप यहाँ हैं, और राजा
अमरावती (स्वर्ग) में हैं (अयोध्या सूनी है)! मैंने बहुत कह डाला, यह सब बड़ी
ढिठाई की है। हे गोसाईं ! जैसा उचित हो, वैसा ही कीजिये ॥४॥
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