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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
निसिन नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच।
नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच॥२५२॥
नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच॥२५२॥
भरतजीको न तो रातको नींद आती है, न दिनमें भूख ही लगती है। वे पवित्र सोचमें
ऐसे विकल हैं, जैसे नीचे (तल) के कीचड़में डूबी हुई मछलीको जलकी कमीसे
व्याकुलता होती है ॥ २५२।।
कीन्हि मातु मिस काल कुचाली।
ईति भीति जस पाकत साली।
केहि बिधि होइ राम अभिषेकू।
मोहि अवकलत उपाउ न एकू॥
ईति भीति जस पाकत साली।
केहि बिधि होइ राम अभिषेकू।
मोहि अवकलत उपाउ न एकू॥
[भरतजी सोचते हैं कि] माता के मिस से काल ने कुचाल की है। जैसे धान के पकते समय
ईति का भय आ उपस्थित हो। अब श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक किस प्रकार हो, मुझे
तो एक भी उपाय नहीं सूझ पड़ता ॥१॥
अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी।
मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी॥
मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ।
राम जननि हठ करबि कि काऊ।
मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी॥
मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ।
राम जननि हठ करबि कि काऊ।
गुरुजीकी आज्ञा मानकर तो श्रीरामजी अवश्य ही अयोध्याको लौट चलेंगे। परन्तु मुनि
वसिष्ठजी तो श्रीरामचन्द्रजीकी रुचि जानकर ही कुछ कहेंगे (अर्थात् वे
श्रीरामजीकी रुचि देखे बिना जानेको नहीं कहेंगे)।माता कौसल्याजीके कहनेसे भी
श्रीरघुनाथजी लौट सकते हैं; पर भला, श्रीरामजीको जन्म देनेवाली माता क्या कभी
हठ करेगी? ॥२॥
मोहि अनुचर कर केतिक बाता।
तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता॥
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू।
हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू॥
तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता॥
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू।
हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू॥
मुझ सेवककी तो बात ही कितनी है ? उसमें भी समय खराब है (मेरे दिन अच्छे नहीं
हैं) और विधाता प्रतिकूल है। यदि मैं हठ करता हूँ तो यह घोर कुकर्म (अधर्म)
होगा, क्योंकि सेवकका धर्म शिवजीके पर्वत कैलाससे भी भारी (निबाहने में कठिन)
है॥३॥
एकउ जुगुति न मन ठहरानी।
सोचत भरतहि रैनि बिहानी॥
प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई।
बैठत पठए रिषयँ बोलाई॥
सोचत भरतहि रैनि बिहानी॥
प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई।
बैठत पठए रिषयँ बोलाई॥
एक भी युक्ति भरतजीके मनमें न ठहरी। सोचते-ही-सोचते रात बीत गयी। भरतजी
प्रात:काल स्नान करके और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषि
वसिष्ठजीने उनको बुलवा भेजा ॥४॥
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