रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

 

दो०- धरम धुरंधर धीर धरि, नयन उघारे राय।
सिरु धुनि लीन्हि उसास असि, मारेसि मोहि कुठायँ॥३०॥


धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले राजा दशरथने धीरज धरकर नेत्र खोले और सिर धुनकर तथा लंबी साँस लेकर इस प्रकार कहा कि इसने मुझे बड़े कुठौर मारा (ऐसी कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर दी, जिससे बच निकलना कठिन हो गया)॥ ३०॥


आगे दीखि जरत रिस भारी।
मनहुँ रोष तरवारि उधारी॥
मूठि कुबुद्धि धार निठुराई।
धरी कूबरी सान बनाई॥

प्रचण्ड क्रोधसे जलती हुई कैकेयी सामने इस प्रकार दिखायी पड़ी, मानो क्रोधरूपी तलवार नंगी (म्यानसे बाहर) खड़ी हो। कुबुद्धि उस तलवारकी मूठ है, निष्ठुरता धार है और वह कुबरी (मन्थरा) रूपी सानपर धरकर तेज की हुई है॥१॥


लखी महीप कराल कठोरा।
सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा॥
बोले राउ कठिन करि छाती।
बानी सबिनय तासु सोहाती॥


राजाने देखा कि यह (तलवार) बड़ी ही भयानक और कठोर है [और सोचा-] क्या सत्य ही यह मेरा जीवन लेगी? राजा अपनी छाती कड़ी करके, बहुत ही नम्रताके साथ उसे (कैकेयीको) प्रिय लगनेवाली वाणी बोले-॥२॥


प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती।
भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती॥
मोरें भरतु रामु दुइ आँखी।
सत्य कहउँ करि संकरु साखी॥


हे प्रिये! हे भीरु ! विश्वास और प्रेमको नष्ट करके ऐसे बुरी तरहके वचन कैसे कह रही हो। मेरे तो भरत और रामचन्द्र दो आँखें (अर्थात् एक-से) हैं; यह मैं शङ्करजीकी साक्षी देकर सत्य कहता हूँ॥३॥


अवसि दूतु मैं पठइब प्राता।
ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता॥
सुदिन सोधि सबु साजु सजाई।
देउँ भरत कहुँ राजु बजाई।


मैं अवश्य सबेरे ही दूत भेजूंगा। दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) सुनते ही तुरंत आ जायँगे। अच्छा दिन (शुभ मुहूर्त) शोधवाकर, सब तैयारी करके डंका बजाकर मैं भरतको राज्य दे दूंगा।। ४॥

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