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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।
सब के संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि॥२९३॥
सब के संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि॥२९३॥
अतएव मुझे पराधीन जानकर (मुझसे न पूछकर) श्रीरामचन्द्रजीके रुख (रुचि), धर्म और
[सत्यके] व्रतको रखते हुए, जो सबके सम्मत और सबके लिये हितकारी हो आप सबका
प्रेम पहचानकर वही कीजिये।। २९३ ॥
भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ।
सहित समाज सराहत राऊ॥
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे।
अरथु अमित अति आखर थोरे॥
सहित समाज सराहत राऊ॥
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे।
अरथु अमित अति आखर थोरे॥
भरतजीके वचन सुनकर और उनका स्वभाव देखकर समाजसहित राजा जनक उनकी सराहना करने
लगे। भरतजीके वचन सुगम और अगम, सुन्दर, कोमल और कठोर हैं। उनमें अक्षर थोड़े
हैं, परन्तु अर्थ अत्यन्त अपार भरा हुआ है ॥१॥
ज्यों मुखु मुकुर मुकुरु निज पानी।
गहि न जाइ अस अदभुत बानी॥
भूप भरतु मुनि सहित समाजू।
गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू।
गहि न जाइ अस अदभुत बानी॥
भूप भरतु मुनि सहित समाजू।
गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू।
जैसे मुख [का प्रतिबिम्ब] दर्पणमें दीखता है और दर्पण अपने हाथमें है, फिर भी
वह (मुखका प्रतिबिम्ब) पकड़ा नहीं जाता, इसी प्रकार भरतजीकी यह अद्भुत वाणी भी
पकड़में नहीं आती (शब्दोंसे उसका आशय समझमें नहीं आता)। [किसीसे कुछ उत्तर देते
नहीं बना] तब राजा जनकजी, भरतजी तथा मुनि वसिष्ठजी समाजके साथ वहाँ गये जहाँ
देवतारूपी कुमुदोंके खिलानेवाले (सुख देनेवाले) चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी थे॥२॥
सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा।
मनहुँ मीनगन नव जल जोगा॥
देव प्रथम कुलगुर गति देखी।
निरखि बिदेह सनेह बिसेषी॥
मनहुँ मीनगन नव जल जोगा॥
देव प्रथम कुलगुर गति देखी।
निरखि बिदेह सनेह बिसेषी॥
यह समाचार सुनकर सब लोग सोच से व्याकुल हो गये; जैसे नये (पहली वर्षाके) जलके
संयोग से मछलियाँ व्याकुल होती हैं। देवताओं ने पहले कुलगुरु वसिष्ठजीकी
[प्रेमविह्वल] दशा देखी, फिर विदेहजी के विशेष स्नेह को देखा;॥३॥
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