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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- प्रिया हास रिस परिहरहि, मागु बिचारि बिबेकु।
जेहिं देखौं अब नयन भरि, भरत राज अभिषेकु॥३२॥
जेहिं देखौं अब नयन भरि, भरत राज अभिषेकु॥३२॥
हे प्रिये! हँसी और क्रोध छोड़ दे और विवेक (उचित-अनुचित)
विचारकर वर माँग, जिससे अब मैं नेत्र भरकर भरतका राज्याभिषेक देख सकूँ।। ३२॥
जिऐ मीन बरु बारि बिहीना।
मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना॥
कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं।
जीवनु मोर राम बिनु नाहीं॥
मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना॥
कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं।
जीवनु मोर राम बिनु नाहीं॥
मछली चाहे बिना पानीके जीती रहे और साँप भी चाहे बिना मणिके दीन
दु:खी होकर जीता रहे। परन्तु मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, मनमें [जरा भी] छल
रखकर नहीं कि मेरा जीवन रामके बिना नहीं है॥१॥
समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना।
जीवनु राम दरस आधीना॥
सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई।
मनहुँ अनल आहुति घृत परई॥
जीवनु राम दरस आधीना॥
सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई।
मनहुँ अनल आहुति घृत परई॥
हे चतुर प्रिये! जी में समझ देख, मेरा जीवन श्रीराम के दर्शन के
अधीन है। राजाके कोमल वचन सुनकर दुर्बुद्धि कैकेयी अत्यन्त जल रही है। मानो
अग्निमें घीकी आहुतियाँ पड़ रही हैं॥२॥
कहइ करहु किन कोटि उपाया।
इहाँ न लागिहि राउरि माया॥
देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं।
मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं॥
इहाँ न लागिहि राउरि माया॥
देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं।
मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं॥
[कैकेयी कहती है.-] आप करोड़ों उपाय क्यों न करें, यहाँ आपकी
माया (चालबाजी) नहीं लगेगी। या तो मैंने जो माँगा है सो दीजिये, नहीं तो
'नाही' करके अपयश लीजिये। मुझे बहुत प्रपञ्च (बखेड़े) नहीं सुहाते॥३॥
रामु साधु तुम्ह साधु सयाने।
राममातु भलि सब पहिचाने।
जस कौसिलाँ मोर भल ताका।
तस फलु उन्हहि देउँ करि साका॥
राममातु भलि सब पहिचाने।
जस कौसिलाँ मोर भल ताका।
तस फलु उन्हहि देउँ करि साका॥
राम साधु हैं, आप सयाने साधु हैं और रामकी माता भी भली हैं;
मैंने सबको पहचान लिया है। कौसल्याने मेरा जैसा भला चाहा है, मैं भी साका
करके (याद रखनेयोग्य) उन्हें वैसा ही फल दूंगी॥४॥
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