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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।
दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर॥२९८॥
दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर॥२९८॥
हे नाथ! आपने अपनी कृपा और भलाईसे मेरा भला किया, जिससे मेरे दूषण (दोष) भी
भूषण (गुण) के समान हो गये और चारों ओर मेरा सुन्दर यश छा गया॥ २९८॥
राउरि रीति सुबानि बड़ाई।
जगत बिदित निगमागम गाई॥
कूर कुटिल खल कुमति कलंकी।
नीच निसील निरीस निसंकी।
जगत बिदित निगमागम गाई॥
कूर कुटिल खल कुमति कलंकी।
नीच निसील निरीस निसंकी।
हे नाथ! आपकी रीति और सुन्दर स्वभावकी बड़ाई जगत्में प्रसिद्ध है, और वेद
शास्त्रोंने गायी है। जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि. कलंकी, नीच, शीलरहित,
निरीश्वरवादी (नास्तिक) और नि:शंक (निडर) हैं ॥१॥
तेउ सुनि सरन सामुहें आए।सकृत प्रनामु किहें अपनाए॥
देखि दोष कबहुँ न उर आने।
सुनि गुन साधु समाज बखाने॥
उन्हें भी आपने शरणमें सम्मुख आया सुनकर एक बार प्रणाम करनेपर ही अपना लिया। उन (शरणागतों) के दोषोंको देखकर भी आप कभी हृदयमें नहीं लाये और उनके गुणोंको सुनकर साधुओंके समाजमें उनका बखान किया ॥२॥
को साहिब सेवकहि नेवाजी।
आप समाज साज सब साजी॥
निज करतूति न समुझिअ सपनें।
सेवक सकुच सोचु उर अपनें॥
आप समाज साज सब साजी॥
निज करतूति न समुझिअ सपनें।
सेवक सकुच सोचु उर अपनें॥
ऐसा सेवकपर कृपा करनेवाला स्वामी कौन है जो आप ही सेवकका सारा साज सामान सज दे
(उसकी सारी आवश्यकताओंको पूर्ण कर दे) और स्वप्न में भी अपनी कोई करनी न समझकर
(अर्थात् मैंने सेवकके लिये कुछ किया है ऐसा न जानकर) उलटा सेवकको संकोच होगा,
इसका सोच अपने हृदयमें रखे!॥३॥
सो गोसाइँ नहिं दूसर कोपी।
भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी।
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना।
गुन गति नट पाठक आधीना॥
भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी।
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना।
गुन गति नट पाठक आधीना॥
मैं भुजा उठाकर और प्रण रोपकर (बड़े जोरके साथ) कहता हूँ, ऐसा स्वामी आपके सिवा
दूसरा कोई नहीं है। [बंदर आदि] पशु नाचते और तोते [सीखे हुए] पाठमें प्रवीण हो
जाते हैं। परन्तु तोते का [पाठप्रवीणतारूप] गुण और पशु के नाचने की गति
[क्रमश:] पढ़ाने वाले और नचाने वाले के अधीन है॥४॥
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