|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ।
लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ।।३०२।।
लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ।।३०२।।
भरतजी, जनकजी, मुनिजन, मन्त्री और ज्ञानी साधु-संतोंको छोड़कर अन्य सभीपर जिस
मनुष्यको जिस योग्य (जिस प्रकृति और जिस स्थितिका) पाया, उस पर वैसे ही देवमाया
लग गयी॥३०२॥
कृपासिंधु लखि लोग दुखारे।
निज सनेहँ सुरपति छल भारे॥
सभा राउ गुर महिसुर मंत्री।
भरत भगति सब कै मति जंत्री॥
निज सनेहँ सुरपति छल भारे॥
सभा राउ गुर महिसुर मंत्री।
भरत भगति सब कै मति जंत्री॥
कृपासिन्धु श्रीरामचन्द्रजीने लोगोंको अपने स्नेह और देवराज इन्द्रके भारी छलसे
दुःखी देखा। सभा, राजा जनक, गुरु, ब्राह्मण और मन्त्री आदि सभीकी बुद्धिको
भरतजीकी भक्तिने कील दिया॥१॥
रामहि चितवत चित्र लिखे से।
सकुचत बोलत बचन सिखे से॥
भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई।
सुनत सुखद बरनत कठिनाई॥
सकुचत बोलत बचन सिखे से॥
भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई।
सुनत सुखद बरनत कठिनाई॥
सब लोग चित्रलिखे-से श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख रहे हैं। सकुचाते हुए सिखाये
हुए-से वचन बोलते हैं। भरतजीकी प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुनने में सुख
देनेवाली है, पर उसके वर्णन करने में कठिनता है ॥२॥
जासु बिलोकि भगति लवलेसू।
प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू॥
महिमा तासु कहै किमि तुलसी।
भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी॥
प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू॥
महिमा तासु कहै किमि तुलसी।
भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी॥
जिनकी भक्तिका लवलेश देखकर मुनिगण और मिथिलेश्वर जनकजी प्रेममें मग्न हो गये,
उन भरतजीकी महिमा तुलसीदास कैसे कहे? उनकी भक्ति और सुन्दर भावसे [कविके]
हृदयमें सुबुद्धि हुलस रही है (विकसित हो रही है)॥३॥
आपु छोटि महिमा बड़ि जानी।
कबिकुल कानि मानि सकुचानी॥
कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई।
मति गति बाल बचन की नाई॥
कबिकुल कानि मानि सकुचानी॥
कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई।
मति गति बाल बचन की नाई॥
परन्तु वह बुद्धि अपनेको छोटी और भरतजीकी महिमाको बड़ी जानकर कविपरम्पराकी
मर्यादाको मानकर सकुचा गयी (उसका वर्णन करनेका साहस नहीं कर सकी)। उसकी
गुणोंमें रुचि तो बहुत है; पर उन्हें कह नहीं सकती। बुद्धिकी गति बालकके
वचनोंकी तरह हो गयी (वह कुण्ठित हो गयी)! ॥४॥
|
|||||
लोगों की राय
No reviews for this book






