रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
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पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

श्रीराम-भरत-संवाद



बोले बचन बानि सरबसु से।
हित परिनाम सुनत ससि रसु से॥
तात भरत तुम्ह धरम धुरीना।
लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना॥

[तदनुसार] ऐसे वचन बोले जो मानो वाणीके सर्वस्व ही थे, परिणाममें हितकारी थे और सुनने में चन्द्रमाके रस (अमृत)-सरीखे थे। [उन्होंने कहा---] हे तात भरत! तुम धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हो, लोक और वेद दोनोंके जाननेवाले और प्रेममें प्रवीण हो ॥ ४॥

करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात।
गुर समाज लघु बंधुगुन कुसमयँ किमि कहि जात॥३०४॥

हे तात! कर्मसे, वचनसे और मनसे निर्मल तुम्हारे समान तुम्हीं हो। गुरुजनोंके समाजमें और ऐसे कुसमयमें छोटे भाईके गुण किस तरह कहे जा सकते हैं ? ॥ ३०४।।

जानहु तात तरनि कुल रीती।
सत्यसंध पितु कीरति प्रीती॥
समउ समाजु लाज गुरजन की।
उदासीन हित अनहित मन की।

हे तात! तुम सूर्यकुलकी रीतिको, सत्यप्रतिज्ञ पिताजीकी कीर्ति और प्रीतिको, समय, समाज और गुरुजनोंकी लज्जा (मर्यादा) को तथा उदासीन, मित्र और शत्रु सबके मनकी बातको जानते हो॥१॥

तुम्हहि बिदित सबही कर करमू।
आपन मोर परम हित धरमू॥
मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा।
तदपि कहउँ अवसर अनुसारा॥

तुमको सबके कर्मों (कर्तव्यों) का और अपने तथा मेरे परम हितकारी धर्मका पता है। यद्यपि मुझे तुम्हारा सब प्रकारसे भरोसा है, तथापि मैं समयके अनुसार कुछ कहता हूँ॥२॥

तात तात बिनु बात हमारी।
केवल गुरकुल कृपाँ सँभारी॥
नतरु प्रजा परिजन परिवारू।
हमहि सहित सबु होत खुआरू॥

हे तात! पिताजीके बिना (उनकी अनुपस्थितिमें) हमारी बात केवल गुरुवंशकी कृपाने ही सम्हाल रखी है; नहीं तो हमारे समेत प्रजा, कुटुम्ब, परिवार सभी बर्बाद हो जाते ॥३॥

जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू।
जग केहि कहहु न होइ कलेसू॥
तस उतपातु तात बिधि कीन्हा।
मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा॥ _

यदि बिना समयके (संध्यासे पूर्व ही) सूर्य अस्त हो जाय, तो कहो जगत्में किसको क्लेश न होगा? हे तात! उसी प्रकारका उत्पात विधाताने यह (पिताकी असामयिक मृत्यु) किया है। पर मुनि महाराजने तथा मिथिलेश्वरने सबको बचा लिया।॥ ४॥

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