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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक॥३१५ ॥
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक॥३१५ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं- [श्रीरामजीने कहा-] मुखिया मुखके समान होना चाहिये, जो
खाने-पीनेको तो एक (अकेला) है, परन्तु विवेकपूर्वक सब अंगोंका पालन-पोषण करता
है।३१५ ॥
राजधरम सरबसु एतनोई।
जिमि मन माहँ मनोरथ गोई॥
बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती।
बिनु अधार मन तोषु न साँती॥
जिमि मन माहँ मनोरथ गोई॥
बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती।
बिनु अधार मन तोषु न साँती॥
राजधर्मका सर्वस्व (सार) भी इतना ही है। जैसे मनके भीतर मनोरथ छिपा रहता है।
श्रीरघुनाथजीने भाई भरतको बहुत प्रकारसे समझाया। परन्तु कोई अवलम्बन पाये बिना
उनके मनमें न सन्तोष हुआ, न शान्ति ॥१॥
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