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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत।
फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत॥३२०॥
फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत॥३२०॥
गुरु वसिष्ठजी और गुरुपत्नी अरुन्धतीजीके चरणोंकी वन्दना करके सीताजी और
लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी हर्ष और विषादके साथ लौटकर पर्णकुटीपर
आये॥३२० ॥
बिदा कीन्ह सनमानि निषादू।
चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू॥
कोल किरात भिल्ल बनचारी।
फेरे फिरे जोहारि जोहारी॥
चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू॥
कोल किरात भिल्ल बनचारी।
फेरे फिरे जोहारि जोहारी॥
फिर सम्मान करके निषादराजको विदा किया। वह चला तो सही, किन्तु उसके हृदयमें
विरहका बड़ा भारी विषाद था। फिर श्रीरामजीने कोल, किरात, भील आदि वनवासी
लोगोंको लौटाया। वे सब जोहार-जोहारकर (वन्दना कर-करके) लौटे॥१॥
प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं।
प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं॥
भरत सनेह सुभाउ सुबानी।
प्रिया अनुज सन कहत बखानी॥
प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं॥
भरत सनेह सुभाउ सुबानी।
प्रिया अनुज सन कहत बखानी॥
प्रभु श्रीरामचन्द्रजी, सीताजी और लक्ष्मणजी बड़की छायामें बैठकर प्रियजन एवं
परिवारके वियोगसे दुःखी हो रहे हैं। भरतजीके स्नेह, स्वभाव और सुन्दर वाणीको
बखान-बखानकर वे प्रिय पत्नी सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसे कहने लगे॥२॥
प्रीति प्रतीति बचन मन करनी।
श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी॥
तेहि अवसर खग मृग जल मीना।
चित्रकूट चर अचर मलीना॥
श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी॥
तेहि अवसर खग मृग जल मीना।
चित्रकूट चर अचर मलीना॥
श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमके वश होकर भरतजीके वचन, मन, कर्मकी प्रीति तथा
विश्वासका अपने श्रीमुखसे वर्णन किया। उस समय पक्षी, पशु और जलकी मछलियाँ,
चित्रकूटके सभी चेतन और जड़ जीव उदास हो गये ॥३॥
बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की।
बरषि सुमन कहि गति घर घर की।
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो।
चले मुदित मन डर न खरो सो॥
बरषि सुमन कहि गति घर घर की।
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो।
चले मुदित मन डर न खरो सो॥
श्रीरघुनाथजीकी दशा देखकर देवताओंने उनपर फूल बरसाकर अपनी घर-घरकी दशा कही
(दुखड़ा सुनाया)। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें प्रणाम कर आश्वासन दिया। तब
वे प्रसन्न होकर चले, मनमें जरा-सा भी डर न रहा ॥४॥
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