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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।
मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।। ३२५॥
मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।। ३२५॥
वे नित्यप्रति प्रभुकी पादुकाओंका पूजन करते हैं, हृदयमें प्रेम समाता नहीं है।
पादुकाओंसे आज्ञा माँग-माँगकर वे बहुत प्रकार (सब प्रकारके) राज-काज करते हैं ॥
३२५ ॥
पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू।
जीह नामु जप लोचन नीरू॥
लखन राम सिय कानन बसहीं।
भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं।
जीह नामु जप लोचन नीरू॥
लखन राम सिय कानन बसहीं।
भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं।
शरीर पुलकित है, हृदयमें श्रीसीता-रामजी हैं। जीभ राम-नाम जप रही है, नेत्रों
में प्रेमका जल भरा है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तो वनमें बसते हैं,
परन्तु भरतजी घरहीमें रहकर तपके द्वारा शरीरको कस रहे हैं ॥१॥
दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू।
सब बिधि भरत सराहन जोगू।
सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं।
देखि दसा मुनिराज लजाहीं।
सब बिधि भरत सराहन जोगू।
सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं।
देखि दसा मुनिराज लजाहीं।
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