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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- परेउ राउ कहि कोटि बिधि, काहे करसि निदानु।
कपट सयानि न कहति कछु, जागति मनहुँ मसानु॥३६॥
कपट सयानि न कहति कछु, जागति मनहुँ मसानु॥३६॥
राजा करोड़ों प्रकारसे (बहुत तरहसे) समझाकर [और यह कहकर] कि तू
क्यों सर्वनाश कर रही है, पृथ्वीपर गिर पड़े। पर कपट करनेमें चतुर कैकेयी कुछ
बोलती नहीं, मानो [मौन होकर] मसान जगा रही हो (श्मशानमें बैठकर प्रेतमन्त्र
सिद्ध कर रही हो)॥३६॥
राम राम रट बिकल भुआलू।
जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू॥
हृदयँ मनाव भोरु जनि होई।
रामहि जाइ कहै जनि कोई॥
जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू॥
हृदयँ मनाव भोरु जनि होई।
रामहि जाइ कहै जनि कोई॥
राजा 'राम-राम' रट रहे हैं और ऐसे व्याकुल हैं, जैसे कोई पक्षी
पंखके बिना बेहाल हो। वे अपने हृदयमें मनाते हैं कि सबेरा न हो, और कोई जाकर
श्रीरामचन्द्रजीसे यह बात न कहे॥१॥
उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर।
अवध बिलोकि सूल होइहि उर॥
भूप प्रीति कैकई कठिनाई।
उभय अवधि बिधि रची बनाई॥
अवध बिलोकि सूल होइहि उर॥
भूप प्रीति कैकई कठिनाई।
उभय अवधि बिधि रची बनाई॥
हे रघुकुलके गुरु (बड़ेरे मूलपुरुष) सूर्यभगवान्! आप अपना उदय
न करें। अयोध्याको [बेहाल] देखकर आपके हृदयमें बड़ी पीड़ा होगी। राजाकी
प्रीति और कैकेयी की निष्ठुरता दोनों को ब्रह्मा ने सीमा तक रचकर बनाया है
(अर्थात् राजा प्रेमकी सीमा हैं और कैकेयी निष्ठुरताकी)॥२॥
बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा।
बीना बेनु संख धुनि द्वारा॥
पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक।
सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक।
बीना बेनु संख धुनि द्वारा॥
पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक।
सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक।
विलाप करते-करते ही राजाको सबेरा हो गया। राजद्वारपर वीणा,
बाँसुरी और शंखकी ध्वनि होने लगी। भाटलोग विरुदावली पढ़ रहे हैं और गवैये
गुणोंका गान कर रहे हैं। सुननेपर राजाको वे बाण-जैसे लगते हैं॥३॥
मंगल सकल सोहाहिं न कैसें।
सहगामिनिहि बिभूषन जैसें॥
तेहि निसि नीद परी नहिं काहू।
राम दरस लालसा उछाहू।
सहगामिनिहि बिभूषन जैसें॥
तेहि निसि नीद परी नहिं काहू।
राम दरस लालसा उछाहू।
राजाको ये सब मङ्गल-साज कैसे नहीं सुहा रहे हैं, जैसे पतिके
साथ सती होनेवाली स्त्रीको आभूषण! श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी लालसा और
उत्साहके कारण उस रात्रिमें किसीको भी नींद नहीं आयी॥४॥
दो०- द्वार भीर सेवक सचिव, कहहिं उदित रबि देखि।
जागेउ अजहुँ न अवधपति, कारनु कवनु बिसेषि॥३७॥
जागेउ अजहुँ न अवधपति, कारनु कवनु बिसेषि॥३७॥
राजद्वारपर मन्त्रियों और सेवकोंकी भीड़ लगी है। वे सब सूर्यको
उदय हुआ देखकर कहते हैं कि ऐसा कौन-सा विशेष कारण है कि अवधपति दशरथजी अभीतक
नहीं जागे?॥ ३७॥
पछिले पहर भूपु नित जागा।
आजु हमहि बड़ अचरजु लागा॥
जाहु सुमंत्र जगावहु जाई।
कीजिअ काजु रजायसु पाई॥
आजु हमहि बड़ अचरजु लागा॥
जाहु सुमंत्र जगावहु जाई।
कीजिअ काजु रजायसु पाई॥
राजा नित्य ही रातके पिछले पहर जाग जाया करते हैं, किन्तु आज
हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। हे सुमन्त्र! जाओ, जाकर राजाको जगाओ। उनकी
आज्ञा पाकर हम सब काम करें॥१॥
गए सुमंत्रु तब राउर माहीं।
देखि भयावन जात डेराहीं॥
धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा।
मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा॥
देखि भयावन जात डेराहीं॥
धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा।
मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा॥
तब सुमन्त्र रावले (राजमहल)में गये, पर महलको भयानक देखकर वे
जाते हुए डर रहे हैं। [ऐसा लगता है] मानो दौड़कर काट खायेगा, उसकी ओर देखा भी
नहीं जाता। मानो विपत्ति और विषादने वहाँ डेरा डाल रखा हो॥२॥
पूछे कोउ न ऊतरु देई।
गए जेहिं भवन भूप कैकेई॥
कहि जयजीव बैठ सिरु नाई।
देखि भूप गति गयउ सुखाई॥
गए जेहिं भवन भूप कैकेई॥
कहि जयजीव बैठ सिरु नाई।
देखि भूप गति गयउ सुखाई॥
पूछनेपर कोई जवाब नहीं देता; वे उस महलमें गये, जहाँ राजा और
कैकेयी थे। 'जय-जीव' कहकर सिर नवाकर (वन्दना करके) बैठे और राजाकी दशा देखकर
तो वे सूख ही गये॥३॥
सोच बिकल बिबरन महि परेऊ।
मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ॥
सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी।
बोली असुभ भरी सुभ छूछी।
मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ॥
सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी।
बोली असुभ भरी सुभ छूछी।
[देखा कि-] राजा सोचसे व्याकुल हैं, चेहरेका रंग उड़ गया है।
जमीनपर ऐसे पड़े हैं मानो कमल जड़ छोड़कर (जड़से उखड़कर) [मुाया] पड़ा हो।
मन्त्री मारे डरके कुछ पूछ नहीं सकते। तब अशुभसे भरी हुई और शुभसे विहीन
कैकेयी बोली-॥४॥
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