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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ, सो मति रामहि देहु।
बचनु मोर तजि रहहिं घर, परिहरि सीलु सनेहु॥४४॥
बचनु मोर तजि रहहिं घर, परिहरि सीलु सनेहु॥४४॥
आप प्रेरकरूपसे सबके हृदयमें हैं। आप श्रीरामचन्द्रको ऐसी
बुद्धि दीजिये जिससे वे मेरे वचनको त्यागकर और शील-स्नेहको छोड़कर घरहीमें रह
जायें॥४४॥।
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ।
नरक परौं बरु सुरपुरु जाऊ॥
सब दुख दुसह सहावहु मोही।
लोचन ओट रामु जनि होंही।
नरक परौं बरु सुरपुरु जाऊ॥
सब दुख दुसह सहावहु मोही।
लोचन ओट रामु जनि होंही।
जगत् में चाहे अपयश हो और सुयश नष्ट हो जाय। चाहे [नया पाप
होनेसे] मैं नरक में गिरूँ, अथवा स्वर्ग चला जाय (पूर्व पुण्योंके फलस्वरूप
मिलनेवाला स्वर्ग चाहे मुझे न मिले)। और भी सब प्रकारके दुःसह दुःख आप मुझसे
सहन करा लें। पर श्रीरामचन्द्र मेरी आँखोंकी ओट न हों॥१॥
अस मन गुनइ राउ नहिं बोला।
पीपर पात सरिस मनु डोला।
रघुपति पितहि प्रेमबस जानी।
पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी॥
पीपर पात सरिस मनु डोला।
रघुपति पितहि प्रेमबस जानी।
पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी॥
राजा मन-ही-मन इस प्रकार विचार कर रहे हैं, बोलते नहीं। उनका मन
पीपलके पत्तेकी तरह डोल रहा है। श्रीरघुनाथजीने पिताको प्रेमके वश जानकर और
यह अनुमान करके कि माता फिर कुछ कहेगी [तो पिताजीको दुःख होगा]-॥२॥
देस काल अवसर अनुसारी।
बोले बचन बिनीत बिचारी॥
तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई।
अनुचितु छमब जानि लरिकाई॥
बोले बचन बिनीत बिचारी॥
तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई।
अनुचितु छमब जानि लरिकाई॥
देश, काल और अवसरके अनुकूल विचारकर विनीत वचन कहे-हे तात! मैं
कुछ कहता हूँ, यह ढिठाई करता हूँ। इस अनौचित्यको मेरी बाल्यावस्था समझकर
क्षमा कीजियेगा॥३॥
अति लघु बात लागि दुखु पावा।
काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा॥
देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता।
सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता॥
काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा॥
देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता।
सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता॥
इस अत्यन्त तुच्छ बात के लिये आपने इतना दुःख पाया। मुझे किसीने
पहले कहकर यह बात नहीं जनायो। स्वामी (आप) को इस दशा में देखकर मैंने माता से
पूछा। उनसे सारा प्रसंग सुनकर मेरे सब अंग शीतल हो गये (मुझे बड़ी प्रसन्नता
हुई)॥४॥
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