रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड


दो०- मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहिं, सोकु न हृदयँ समाइ।
मनहुँ करुन रस कटकई, उतरी अवध बजाइ॥४६॥


सबके मुख सूखे जाते हैं, आँखों से आँसू बहते हैं, शोक हृदय में नहीं समाता। मानो करुणा रस की सेना अवधपर डंका बजाकर उतर आयी हो॥४६॥

मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी।
जहँ तहँ देहिं कैकइहि गारी॥
एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ।
छाइ भवन पर पावकु धरेऊ॥


सब मेल मिल गये थे (सब संयोग ठीक हो गये थे), इतने में ही विधाता ने बात बिगाड़ दी! जहाँ-तहाँ लोग कैकेयी को गाली दे रहे हैं ! इस पापिन को क्या सूझ पड़ा जो इसने छाये घर पर आग रख दी॥ १॥

निज कर नयन काढ़ि चह दीखा।
डारि सुधा बिषु चाहत चीखा।
कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी।
भइ रघुबंस बेनु बन आगी॥

यह अपने हाथ से अपनी आँखों को निकालकर (आँखोंके बिना ही) देखना चाहती है, और अमृत फेंककर विष चखना चाहती है ! यह कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कैकेयी रघुवंशरूपी बाँस के वनके लिये अग्नि हो गयी!॥२॥


पालव बैठि पेड़ एहिं काटा।
सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा।
सदा रामु एहि प्रान समाना।
कारन कवन कुटिलपनु ठाना॥


पत्तेपर बैठकर इसने पेड़को काट डाला। सुखमें शोकका ठाट ठटकर रख दिया! श्रीरामचन्द्रजी इसे सदा प्राणोंके समान प्रिय थे। फिर भी न जाने किस कारण इसने यह कुटिलता ठानी॥३॥


सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ।
सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ॥
निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई।
जानि न जाइ नारि गति भाई॥


कवि सत्य ही कहते हैं कि स्त्रीका स्वभाव सब प्रकारसे पकड़में न आने योग्य अथाह और भेदभरा होता है। अपनी परछाहीं भले ही पकड़ जाय, पर भाई! स्त्रियोंकी गति (चाल) नहीं जानी जाती॥ ४॥

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