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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
सो०- सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।
तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी॥५०॥
तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी॥५०॥
इस प्रकार सखियोंने ऐसी सीख दी जो सुननेमें मीठी और परिणाममें
हितकारी थी। पर कुटिला कुबरीकी सिखायी-पढ़ायी हुई कैकेयीने इसपर जरा भी कान
नहीं दिया॥५०॥
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी।
मृगिन्ह चितव जनु बाधिनि भूखी॥
ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी।
चलीं कहत मतिमंद अभागी॥
मृगिन्ह चितव जनु बाधिनि भूखी॥
ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी।
चलीं कहत मतिमंद अभागी॥
कैकेयी कोई उत्तर नहीं देती, वह दुःसह क्रोधके मारे रूखी
(बेमुरव्वत) हो रही है। ऐसे देखती है मानो भूखी बाघिन हरिनियोंको देख रही हो।
तब सखियोंने रोगको असाध्य समझकर उसे छोड़ दिया। सब उसको मन्दबुद्धि, अभागिनी
कहती हुई चल दीं॥१॥
राजु करत यह दैअँ बिगोई।
कीन्हेसि अस जस करइ न कोई॥
एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारी।
देहिं कुचालिहि कोटिक गारी॥
कीन्हेसि अस जस करइ न कोई॥
एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारी।
देहिं कुचालिहि कोटिक गारी॥
राज्य करते हुए इस कैकेयीको दैवने नष्ट कर दिया। इसने जैसा कुछ किया, वैसा कोई भी न करेगा! नगरके सब स्त्री-पुरुष इस प्रकार विलाप कर रहे हैं और उस कुचाली कैकेयीको करोड़ों गालियाँ दे रहे हैं॥२॥
जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा।
कवनि राम बिनु जीवन आसा॥
बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी।
जनु जलचर गन सूखत पानी॥
कवनि राम बिनु जीवन आसा॥
बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी।
जनु जलचर गन सूखत पानी॥
लोग विषमज्वर (भयानक दुःखकी आग) से जल रहे हैं। लंबी साँसें
लेते हुए वे कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीने की कौन आशा है। महान्
वियोग [की आशंका] से प्रजा ऐसी व्याकुल हो गयी है मानो पानी सूखनेके समय जलचर
जीवों का समुदाय व्याकुल हो!॥३॥
अति बिषाद बस लोग लोगाईं।
गए मातु पहिं रामु गोसाईं।
मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ।
मिटा सोचु जनि राखै राऊ।
गए मातु पहिं रामु गोसाईं।
मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ।
मिटा सोचु जनि राखै राऊ।
सभी पुरुष और स्त्रियाँ अत्यन्त विषादके वश हो रहे हैं। स्वामी
श्रीरामचन्द्रजी माता कौसल्याके पास गये। उनका मुख प्रसन्न है और चित्तमें
चौगुना चाव (उत्साह) है। यह सोच मिट गया है कि राजा कहीं रख न लें।
[श्रीरामजीको राजतिलककी बात सुनकर विषाद हुआ था कि सब भाइयोंको छोड़कर बड़े
भाई मुझको ही राजतिलक क्यों होता है। अब माता कैकेयीकी आज्ञा और पिताकी मौन
सम्मति पाकर वह सोच मिट गया।]॥ ४॥
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