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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
श्रीराम-कौसल्या-सीता-संवाद
मातु समीप कहत सकुचाहीं।
बोले समउ समुझि मन माहीं॥
राजकुमारि सिखावनु सुनहू।
आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू॥
बोले समउ समुझि मन माहीं॥
राजकुमारि सिखावनु सुनहू।
आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू॥
आपन मोर नीक जौं चहहू।
बचनु हमार मानि गृह रहहू॥
आयसु मोर सासु सेवकाई।
सब बिधि भामिनि भवन भलाई।
बचनु हमार मानि गृह रहहू॥
आयसु मोर सासु सेवकाई।
सब बिधि भामिनि भवन भलाई।
एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा।
सादर सासु ससुर पद पूजा।
जब जब मातु करिहि सुधि मोरी।
होइहि प्रेम बिकल मति भोरी।
सादर सासु ससुर पद पूजा।
जब जब मातु करिहि सुधि मोरी।
होइहि प्रेम बिकल मति भोरी।
तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी।
सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी॥
कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही।
सुमुखि मातु हित राखउँ तोही॥
सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी॥
कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही।
सुमुखि मातु हित राखउँ तोही॥






