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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- बहुरि बच्छ कहि लालु कहि, रघुपति रघुबर तात।
कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ, हरषि निरखिहउँ गात॥६८॥
कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ, हरषि निरखिहउँ गात॥६८॥
लखि सनेह कातरि महतारी।
बचनु न आव बिकल भइ भारी॥
राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना।
समउ सनेहु न जाइ बखाना॥
बचनु न आव बिकल भइ भारी॥
राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना।
समउ सनेहु न जाइ बखाना॥
तब जानकी सासु पग लागी।
सुनिअ माय मैं परम अभागी॥
सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा।
मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।।
सुनिअ माय मैं परम अभागी॥
सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा।
मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।।
तजब छोभु जनि छाडिअ छोहू।
करमु कठिन कछु दोसु न मोहू॥
सुनि सिय बचन सासु अकुलानी।
दसा कवनि बिधि कहौं बखानी॥
करमु कठिन कछु दोसु न मोहू॥
सुनि सिय बचन सासु अकुलानी।
दसा कवनि बिधि कहौं बखानी॥






