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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- आरति बस सनमुख भइउँ, बिलगु न मानब तात।
आरजसुत पद कमल बिनु, बादि जहाँ लगि नात॥९७॥
आरजसुत पद कमल बिनु, बादि जहाँ लगि नात॥९७॥
पितु बैभव बिलास मैं डीठा।
नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा॥
सुखनिधान अस पितु गृह मोरें।
पिय बिहीन मन भाव न भोरें॥
नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा॥
सुखनिधान अस पितु गृह मोरें।
पिय बिहीन मन भाव न भोरें॥
ससुर चक्कवइ कोसलराऊ।
भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥
आगे होइ जेहि सुरपति लेई।
अरध सिंघासन आसनु देई॥
भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥
आगे होइ जेहि सुरपति लेई।
अरध सिंघासन आसनु देई॥
ससुर एतादृस अवध निवासू।
प्रिय परिवारु मातु सम सासू॥
बिनु रघुपति पद पदुम परागा।
मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा॥
प्रिय परिवारु मातु सम सासू॥
बिनु रघुपति पद पदुम परागा।
मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा॥






