रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड


दो०- आरति बस सनमुख भइउँ, बिलगु न मानब तात।
आरजसुत पद कमल बिनु, बादि जहाँ लगि नात॥९७॥


किन्तु हे तात! मैं आर्त होकर ही आपके सम्मुख हुई हूँ, आप बुरा न मानियेगा। आर्यपुत्र (स्वामी) के चरणकमलों के बिना जगत् में जहाँ तक नाते हैं सभी मेरे लिये व्यर्थ हैं।। ९७॥

पितु बैभव बिलास मैं डीठा।
नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा॥
सुखनिधान अस पितु गृह मोरें।
पिय बिहीन मन भाव न भोरें॥

मैंने पिताजी के ऐश्वर्यकी छटा देखी है, जिनके चरण रखने की चौकी से सर्वशिरोमणि राजाओं के मुकुट मिलते हैं (अर्थात् बड़े-बड़े राजा जिनके चरणों में प्रणाम करते हैं) ऐसे पिता का घर भी, जो सब प्रकार के सुखों का भण्डार है, पति के बिना मेरे मन को भूलकर भी नहीं भाता॥१॥

ससुर चक्कवइ कोसलराऊ।
भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥
आगे होइ जेहि सुरपति लेई।
अरध सिंघासन आसनु देई॥

मेरे ससुर कोसलराज चक्रवर्ती सम्राट हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकों में प्रकट है; इन्द्र भी आगे होकर जिनका स्वागत करता है और अपने आधे सिंहासन पर बैठने के लिये स्थान देता है॥२॥

ससुर एतादृस अवध निवासू।
प्रिय परिवारु मातु सम सासू॥
बिनु रघुपति पद पदुम परागा।
मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा॥

ऐसे [ऐश्वर्य और प्रभावशाली] ससुर; [उनकी राजधानी] अयोध्या का निवास; प्रिय कुटुम्बी और माता के समान सासुएँ-ये कोई भी श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों की रज के बिना मुझे स्वप्न में भी सुखदायक नहीं लगते॥ ३॥

अगम पंथ बनभूमि पहारा।
करि केहरि सर सरित अपारा॥
कोल किरात कुरंग बिहंगा।
मोहि सब सुखद प्रानपति संगा॥

दुर्गम रास्ते, जंगली धरती, पहाड़, हाथी, सिंह, अथाह तालाब एवं नदियाँ; कोल,भील, हिरन और पक्षी-प्राणपति (श्रीरघुनाथजी) के साथ रहते ये सभी मुझे सुख देनेवाले होंगे॥४॥

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