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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।
पूजिहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ॥१०३॥
पूजिहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ॥१०३॥
तुम अपने प्राणनाथ और देवरसहित कुशलपूर्वक अयोध्या लौटोगी। तुम्हारी सारी मन:कामनाएँ पूरी होंगी और तुम्हारा सुन्दर यश जगत् भर में छा जायगा।।१०३॥
गंग बचन सुनि मंगल मूला।
मुदित सीय सुरसरि अनुकूला॥
तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू।
सुनत सूख मुखु भा उर दाहू॥
मुदित सीय सुरसरि अनुकूला॥
तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू।
सुनत सूख मुखु भा उर दाहू॥
मङ्गल के मूल गङ्गाजी के वचन सुनकर और देवनदी को अनुकूल देखकर सीताजी आनन्दित हुईं। तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने निषादराज गुह से कहा कि भैया! अब तुम घर जाओ! यह सुनते ही उसका मुँह सूख गया और हृदय में दाह उत्पन्न हो गया॥१॥
दीन बचन गुह कह कर जोरी।
बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी॥
नाथ साथ रहि पंथु देखाई।
करि दिन चारि चरन सेवकाई॥
बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी॥
नाथ साथ रहि पंथु देखाई।
करि दिन चारि चरन सेवकाई॥
गुह हाथ जोड़कर दीन वचन बोला-हे रघुकुलशिरोमणि! मेरी विनती सुनिये। मैं नाथ (आप)के साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, चार (कुछ) दिन चरणों की सेवा करके--॥२॥
जेहिं बन जाइ रहब रघुराई।
परनकुटी मैं करबि सुहाई॥
तब मोहि कहँ जसि देब रजाई।
सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई॥
परनकुटी मैं करबि सुहाई॥
तब मोहि कहँ जसि देब रजाई।
सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई॥
हे रघुराज! जिस वनमें आप जाकर रहेंगे, वहाँ मैं सुन्दर पर्णकुटी (पत्तोंकी कुटिया) बना दूंगा। तब मुझे आप जैसी आज्ञा देंगे, मुझे रघुवीर (आप) की दुहाई है, मैं वैसा ही करूँगा॥३॥
सहज सनेह राम लखि तासू।
संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू॥
पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे।
करि परितोषु बिदा तब कीन्हे॥
संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू॥
पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे।
करि परितोषु बिदा तब कीन्हे॥
उसके स्वाभाविक प्रेमको देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने उसको साथ ले लिया, इससे गुह के हृदयमें बड़ा आनन्द हुआ। फिर गुह (निषादराज) ने अपनी जाति के लोगोंको बुला लिया और उनका संतोष कराके तब उनको विदा किया॥४॥
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