|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ।
सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ॥१०४॥
सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ॥१०४॥
तब प्रभु श्रीरघुनाथजी गणेशजी और शिवजीका स्मरण करके तथा गङ्गाजीको मस्तक नवाकर सखा निषादराज, छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित वनको चले॥१०४॥
प्रयाग पहुँचना, श्रीराम भरद्वाज संवाद, यमुनातीरनिवासियों का प्रेम
तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू।
लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू॥
प्रात प्रातकृत करि रघुराई।
तीरथराजु दीख प्रभु जाई॥
लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू॥
प्रात प्रातकृत करि रघुराई।
तीरथराजु दीख प्रभु जाई॥
उस दिन पेड़ के नीचे निवास हुआ। लक्ष्मणजी और सखा गुहने [विश्रामकी] सब सुव्यवस्था कर दी। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने सबेरे प्रात:काल की सब क्रियाएँ करके जाकर तीर्थो के राजा प्रयाग के दर्शन किये॥१॥
सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी।
माधव सरिस मीतु हितकारी॥
चारि पदारथ भरा भंडारू।
पुन्य प्रदेस देस अति चारू॥
माधव सरिस मीतु हितकारी॥
चारि पदारथ भरा भंडारू।
पुन्य प्रदेस देस अति चारू॥
उस राजाका सत्य मन्त्री है, श्रद्धा प्यारी स्त्री है और श्रीवेणीमाधवजी-सरीखे हितकारी मित्र हैं। चार पदार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) से भण्डार भरा है और वह पुण्यमय प्रान्त ही उस राजाका सुन्दर देश है॥२॥
छेत्रु अगम गढ़ गाढ़ सुहावा।
सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा॥
सेन सकल तीरथ बर बीरा।
कलुष अनीक दलन रनधीरा॥
सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा॥
सेन सकल तीरथ बर बीरा।
कलुष अनीक दलन रनधीरा॥
प्रयाग क्षेत्र ही दुर्गम, मजबूत और सुन्दर गढ़ (किला) है, जिसको स्वप्नमें भी [पापरूपी] शत्रु नहीं पा सके हैं। सम्पूर्ण तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ वीर सैनिक हैं, जो पाप की सेना को कुचल डालने वाले और बड़े रणधीर हैं।। ३।।
संगमु सिंहासनु सुठि सोहा।
छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा॥
चवर जमुन अरु गंग तरंगा।
देखि होहिं दुख दारिद भंगा।
छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा॥
चवर जमुन अरु गंग तरंगा।
देखि होहिं दुख दारिद भंगा।
[गङ्गा, यमुना और सरस्वतीका] सङ्गम ही उसका अत्यन्त सुशोभित सिंहासन है। अक्षयवट छत्र है, जो मुनियों के भी मन को मोहित कर लेता है। यमुनाजी और गङ्गाजी की तरंगें उसके [श्याम और श्वेत] चँवर हैं, जिनको देखकर ही दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाती है॥ ४॥
|
|||||
लोगों की राय
No reviews for this book






