रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।
कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन॥११२॥


इस प्रकार वे यात्री प्रेमवश पुलकित शरीर हो और नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भरकर पूछते हैं। किन्तु कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी कोमल विनययुक्त वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं॥११२॥

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं।
तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं॥
केहि सुकृती केहि घरी बसाए।
धन्य पुन्यमय परम सुहाए॥


जो गाँव और पुरवे रास्ते में बसे हैं, नागों और देवताओं के नगर उनको देखकर प्रशंसापूर्वक ईर्ष्या करते और ललचाते हुए कहते हैं कि किस पुण्यवान ने किस शुभ घड़ी में इनको बसाया था, जो आज ये इतने धन्य और पुण्यमय तथा परम सुन्दर हो रहे हैं॥१॥

जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं।
तिन्ह समान अमरावति नाहीं॥
पुन्यपुंज मग निकट निवासी।
तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी॥


जहाँ-जहाँ श्रीरामचन्द्रजी के चरण चले जाते हैं, उनके समान इन्द्र की पुरी अमरावती भी नहीं है। रास्ते के समीप बसने वाले भी बड़े पुण्यात्मा हैं-स्वर्ग में रहने वाले देवता भी उनकी सराहना करते हैं—॥२॥

जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि।
सीता लखन सहित घनस्यामहि॥
जे सर सरित राम अवगाहहिं।
तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं॥

जो नेत्र भरकर सीताजी और लक्ष्मणजी सहित घनश्याम श्रीरामजी के दर्शन करते हैं, जिन तालाबों और नदियों में श्रीरामजी स्नान कर लेते हैं, देवसरोवर और देवनदियाँ भी उनकी बड़ाई करती हैं॥३॥

जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई।
करहिं कलपतरु तासु बड़ाई॥
परसि राम पद पदुम परागा।
मानति भूमि भूरि निज भागा।

जिस वृक्ष के नीचे प्रभु जा बैठते हैं, कल्पवृक्ष भी उसकी बड़ाई करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के चरण कमलों की रज का स्पर्श करके पृथ्वी अपना बड़ा सौभाग्य मानती है॥४॥

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