|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।
राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेइँ कीन्ह॥१११॥
राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेइँ कीन्ह॥१११॥
तब श्रीरामचन्द्रजी ने सखा गुह को अनेकों तरह से [घर लौट जाने के लिये] समझाया। श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा को सिर चढ़ाकर उसने अपने घर को गमन किया॥१११॥
यमुना का प्रणाम, वनवासियों का प्रेम
पुनि सियँ राम लखन कर जोरी।
जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी॥
चले ससीय मुदित दोउ भाई।
रबितनुजा कइ करत बड़ाई।
जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी॥
चले ससीय मुदित दोउ भाई।
रबितनुजा कइ करत बड़ाई।
फिर सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मणजी ने हाथ जोड़कर यमुनाजी को पुनः प्रणाम किया और सूर्यकन्या यमुनाजी की बड़ाई करते हुए सीताजी सहित दोनों भाई प्रसन्नतापूर्वक आगे चले॥१॥
पथिक अनेक मिलहिं मग जाता।
कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता।
राज लखन सब अंग तुम्हारें।
देखि सोचु अति हृदय हमारे॥
कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता।
राज लखन सब अंग तुम्हारें।
देखि सोचु अति हृदय हमारे॥
रास्ते में जाते हुए उन्हें अनेकों यात्री मिलते हैं। वे दोनों भाइयों को देखकर उनसे प्रेमपूर्वक कहते हैं कि तुम्हारे सब अङ्गों में राजचिह्न देखकर हमारे हृदय में बड़ा सोच होता है॥२॥
मारग चलहु पयादेहि पाएँ।
ज्योतिषु झूठ हमारे भाएँ।
अगमु पंथु गिरि कानन भारी।
तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी॥
ज्योतिषु झूठ हमारे भाएँ।
अगमु पंथु गिरि कानन भारी।
तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी॥
[ऐसे राजचिह्नों के होते हुए भी] तुम लोग रास्ते में पैदल ही चल रहे हो, इससे हमारी समझ में आता है कि ज्योतिष-शास्त्र झूठा ही है। भारी जंगल और बड़े बड़े पहाड़ों का दुर्गम रास्ता है। तिस पर तुम्हारे साथ सुकुमारी स्त्री है॥३॥
करि केहरि बन जाइ न जोई।
हम सँग चलहिं जो आयसु होई॥
जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई।
फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई॥
हम सँग चलहिं जो आयसु होई॥
जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई।
फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई॥
हाथी और सिंहों से भरा यह भयानक वन देखा तक नहीं जाता। यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें। आप जहाँ तक जायँगे वहाँ तक पहुँचाकर, फिर आपको प्रणाम करके हम लौट आवेंगे।॥४॥
|
|||||
लोगों की राय
No reviews for this book






