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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०-- एक देखि बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।
कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रम गवनब अबहिं कि प्रात॥११४॥
कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रम गवनब अबहिं कि प्रात॥११४॥
कोई बड़की सुन्दर छाया देखकर, वहाँ नरम घास और पत्ते बिछाकर कहते हैं कि क्षणभर यहाँ बैठकर थकावट मिटा लीजिये। फिर चाहे अभी चले जाइयेगा, चाहे सबेरे।। ११४॥
एक कलस भरि आनहिं पानी।
अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी॥
सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी।
राम कृपाल सुसील बिसेषी॥
अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी॥
सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी।
राम कृपाल सुसील बिसेषी॥
कोई घड़ा भरकर पानी ले आते हैं और कोमल वाणी से कहते हैं-नाथ! आचमन तो कर लीजिये। उनके प्यारे वचन सुनकर और उनका अत्यन्त प्रेम देखकर दयालु और परम सुशील श्रीरामचन्द्रजी ने-॥१॥
जानी श्रमित सीय मन माहीं।
घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं॥
मुदित नारि नर देखहिं सोभा।
रूप अनूप नयन मनु लोभा।।
घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं॥
मुदित नारि नर देखहिं सोभा।
रूप अनूप नयन मनु लोभा।।
मन में सीताजी को थकी हुई जानकर घड़ी भर बड़ की छाया में विश्राम किया। स्त्री-पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं। अनुपम रूप ने उनके नेत्र और मनों को लुभा लिया है॥ २॥
एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा।
रामचंद्र मुख चंद चकोरा॥
तरुन तमाल बरन तनु सोहा।
देखत कोटि मदन मनु मोहा॥
रामचंद्र मुख चंद चकोरा॥
तरुन तमाल बरन तनु सोहा।
देखत कोटि मदन मनु मोहा॥
सब लोग टकटकी लगाये श्रीरामचन्द्रजी के मुखचन्द्र को चकोर की तरह (तन्मय होकर) देखते हुए चारों ओर सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजी का नवीन तमाल वृक्ष के रंगका (श्याम) शरीर अत्यन्त शोभा दे रहा है, जिसे देखते ही करोड़ों कामदेवोंके मन मोहित हो जाते हैं॥३॥
दामिनि बरन लखन सुठि नीके।
नख सिख सुभग भावते जी के॥
मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा।
सोहहिं कर कमलनि धनु तीरा॥
नख सिख सुभग भावते जी के॥
मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा।
सोहहिं कर कमलनि धनु तीरा॥
बिजली के-से रंग के लक्ष्मणजी बहुत ही भले मालूम होते हैं। वे नख से शिखा तक सुन्दर हैं, और मन को बहुत भाते हैं। दोनों मुनियों के (वल्कल आदि) वस्त्र पहने हैं और कमर में तरकस कसे हुए हैं। कमलके समान हाथोंमें धनुष-बाण शोभित हो रहे हैं॥४॥
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