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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।
सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल॥११५॥
सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल॥११५॥
उनके सिरों पर सुन्दर जटाओं के मुकुट हैं; वक्षःस्थल, भुजा और नेत्र विशाल हैं और शरत् पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान सुन्दर मुखों पर पसीने की बूंदों का समूह शोभित हो रहा है।।११५॥
बरनि न जाइ मनोहर जोरी।
सोभा बहुत थोरि मति मोरी॥
राम लखन सिय सुंदरताई।
सब चितवहिं चित मन मति लाई॥
सोभा बहुत थोरि मति मोरी॥
राम लखन सिय सुंदरताई।
सब चितवहिं चित मन मति लाई॥
उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि शोभा बहुत अधिक है, और मेरी बुद्धि थोड़ी है। श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी की सुन्दरता को सब लोग मन, चित्त और बुद्धि तीनोंको लगाकर देख रहे हैं॥१॥
थके नारि नर प्रेम पिआसे।
मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से॥
सीय समीप ग्रामतिय जाहीं।
पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं॥
मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से॥
सीय समीप ग्रामतिय जाहीं।
पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं॥
प्रेम के प्यासे [वे गाँवों के] स्त्री-पुरुष [इनके सौन्दर्य-माधुर्य की छटा देखकर] ऐसे थकित रह गये जैसे दीपक को देखकर हिरनी और हिरन [निस्तब्ध रह जाते हैं] ! गाँवों की स्त्रियाँ सीताजी के पास जाती हैं; परन्तु अत्यन्त स्नेह के कारण पूछते सकुचाती हैं॥२॥
बार बार सब लागहिं पाएँ।
कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ।
राजकुमारि बिनय हम करहीं।
तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं।
कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ।
राजकुमारि बिनय हम करहीं।
तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं।
बार-बार सब उनके पाँव लगती और सहज ही सीधे-सादे कोमल वचन कहती हैं-हे राजकुमारी ! हम विनती करती (कुछ निवेदन करना चाहती) हैं, परन्तु स्त्री स्वभाव के कारण कुछ पूछते हुए डरती हैं॥३॥
स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी।
बिलगु न मानब जानि गवाँरी॥
राजकुर दोउ सहज सलोने।
इन्ह तें लही दुति मरकत सोने॥
बिलगु न मानब जानि गवाँरी॥
राजकुर दोउ सहज सलोने।
इन्ह तें लही दुति मरकत सोने॥
हे स्वामिनि ! हमारी ढिठाई क्षमा कीजियेगा और हमको गँवारी जानकर बुरा न मानियेगा। ये दोनों राजकुमार स्वभाव से ही लावण्यमय (परम सुन्दर) हैं। मरकतमणि (पन्ने) और सुवर्ण ने कान्ति इन्हीं से पायी है (अर्थात् मरकतमणि में और स्वर्ण में जो हरित और स्वर्णवर्ण की आभा है वह इनकी हरिताभनील और स्वर्णकान्ति के एक कण के बराबर भी नहीं है)॥४॥
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