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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।
किमि चलिहहिं मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर॥१२०॥
किमि चलिहहिं मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर॥१२०॥
इस प्रकार प्रिय वचन कह-कहकर सब नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर लेते हैं और कहते हैं कि ये अत्यन्त सुकुमार शरीर वाले दुर्गम (कठिन) मार्गमें कैसे चलेंगे। १२०॥
नारि सनेह बिकल बस होहीं।
चकई साँझ समय जनु सोहीं।
मृदु पद कमल कठिन मगु जानी।
गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी॥
चकई साँझ समय जनु सोहीं।
मृदु पद कमल कठिन मगु जानी।
गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी॥
स्त्रियाँ स्नेहवश विकल हो जाती हैं। मानो सन्ध्या के समय चकवी [भावी वियोगकी पीड़ासे] सोह रही हों (दुःखी हो रही हों)। इनके चरणकमलों को कोमल तथा मार्ग को कठोर जानकर वे व्यथित हृदयसे उत्तम वाणी कहती हैं-॥ १॥
परसत मृदुल चरन अरुनारे।
सकुचति महि जिमि हृदय हमारे॥
जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा।
कस न सुमनमय मारगु कीन्हा॥
सकुचति महि जिमि हृदय हमारे॥
जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा।
कस न सुमनमय मारगु कीन्हा॥
इनके कोमल और लाल-लाल चरणों (तलवों) को छूते ही पृथ्वी वैसे ही सकुचा जाती है जैसे हमारे हृदय सकुचा रहे हैं। जगदीश्वर ने यदि इन्हें वनवास ही दिया, तो सारे रास्ते को पुष्पमय क्यों नहीं बना दिया?॥२॥
जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं।
ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं॥
जे नर नारि न अवसर आए।
तिन्ह सिय रामु न देखन पाए।
ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं॥
जे नर नारि न अवसर आए।
तिन्ह सिय रामु न देखन पाए।
यदि ब्रह्मा से माँगे मिले तो हे सखि! [हम तो उनसे माँगकर] इन्हें अपनी आँखों में ही रखें! जो स्त्री-पुरुष इस अवसर पर नहीं आये, वे श्रीसीतारामजी को नहीं देख सके॥३॥
सुनि सुरूपु बूझहिं अकुलाई।
अब लगि गए कहाँ लगि भाई॥
समरथ धाइ बिलोकहिं जाई।
प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई।
अब लगि गए कहाँ लगि भाई॥
समरथ धाइ बिलोकहिं जाई।
प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई।
उनके सौन्दर्यको सुनकर वे व्याकुल होकर पूछते हैं कि भाई! अबतक वे कहाँतक गये होंगे? और जो समर्थ हैं वे दौड़ते हुए जाकर उनके दर्शन कर लेते हैं और जन्मका परम फल पाकर, विशेष आनन्दित होकर लौटते हैं॥४॥
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