|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार।
बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार॥११९॥
बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार॥११९॥
जो ये सुन्दर और अत्यन्त सुकुमार होकर मुनियोंके (वल्कल) वस्त्र पहनते और जटा धारण करते हैं, तो फिर करतार (विधाता) ने भाँति-भाँतिके गहने और कपड़े वृथा ही बनाये॥११९॥
जौं ए कंद मूल फल खाहीं।
बादि सुधादि असन जग माहीं॥
एक कहहिं ए सहज सुहाए।
आपु प्रगट भए बिधि न बनाए।
बादि सुधादि असन जग माहीं॥
एक कहहिं ए सहज सुहाए।
आपु प्रगट भए बिधि न बनाए।
जो ये कन्द, मूल, फल खाते हैं तो जगत्में अमृत आदि भोजन व्यर्थ ही हैं। कोई एक कहते हैं-ये स्वभाव से ही सुन्दर हैं [इनका सौन्दर्य-माधुर्य नित्य और स्वाभाविक है]। ये अपने-आप प्रकट हुए हैं, ब्रह्मा के बनाये नहीं हैं॥१॥
जहँ लगि बेद कही बिधि करनी।
श्रवन नयन मन गोचर बरनी॥
देखहु खोजि भुअन दस चारी।
कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी॥
श्रवन नयन मन गोचर बरनी॥
देखहु खोजि भुअन दस चारी।
कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी॥
हमारे कानों, नेत्रों और मन के द्वारा अनुभव में आनेवाली विधाता की करनी को जहाँ तक वेदों ने वर्णन करके कहा है, वहाँ तक चौदहों लोकों में ढूँढ देखो, ऐसे पुरुष और ऐसी स्त्रियाँ कहाँ हैं ? [कहीं भी नहीं हैं, इसीसे सिद्ध है कि ये विधाता के चौदहों लोकों से अलग हैं और अपनी महिमा से ही आप निर्मित हुए हैं]॥२॥
इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा।
पटतर जोग बनावै लागा॥
कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए।
तेहिं इरिषा बन आनि दुराए॥
पटतर जोग बनावै लागा॥
कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए।
तेहिं इरिषा बन आनि दुराए॥
इन्हें देखकर विधाता का मन अनुरक्त (मुग्ध) हो गया, तब वह भी इन्हीं की उपमा के योग्य दूसरे स्त्री-पुरुष बनाने लगा। उसने बहुत परिश्रम किया, परन्तु कोई उसकी अटकल में ही नहीं आये (पूरे नहीं उतरे)। इसी ईर्ष्या के मारे उसने इनको जंगल में लाकर छिपा दिया है॥३॥
एक कहहिं हम बहुत न जानहिं।
आपुहि परम धन्य करि मानहिं॥
ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे।
जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे॥
आपुहि परम धन्य करि मानहिं॥
ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे।
जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे॥
कोई एक कहते हैं- हम बहुत नहीं जानते। हाँ, अपने को परम धन्य अवश्य मानते हैं [जो इनके दर्शन कर रहे हैं और हमारी समझ में वे भी बड़े पुण्यवान् हैं जिन्होंने इनको देखा है, जो देख रहे हैं और जो देखेंगे॥४॥
|
|||||
लोगों की राय
No reviews for this book






