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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन।
सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगे आयउ लेन॥१२४॥
सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगे आयउ लेन॥१२४॥
पवित्र और सुन्दर आश्रम को देखकर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी हर्षित हुए।
रघुश्रेष्ठ श्रीरामजी का आगमन सुनकर मुनि वाल्मीकिजी उन्हें लेने के लिये आगे
आये॥१२४॥
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मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा।
आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा॥
देखि राम छबि नयन जुड़ाने।
करि सनमानु आश्रमहिं आने॥
आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा॥
देखि राम छबि नयन जुड़ाने।
करि सनमानु आश्रमहिं आने॥
श्रीरामचन्द्रजीने मुनि को दण्डवत् किया। विप्रश्रेष्ठ मुनि ने उन्हें आशीर्वाद
दिया। श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गये। सम्मानपूर्वक
मुनि उन्हें आश्रम में ले आये॥१॥
मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए।
कंद मूल फल मधुर मगाए।
सिय सौमित्रि राम फल खाए।
तब मुनि आश्रम दिए सुहाए।
कंद मूल फल मधुर मगाए।
सिय सौमित्रि राम फल खाए।
तब मुनि आश्रम दिए सुहाए।
श्रेष्ठ मुनि वाल्मीकिजी ने प्राणप्रिय अतिथियों को पाकर उनके लिये मधुर कन्द,
मूल और फल मँगवाये। श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और रामचन्द्रजी ने फलोंको खाया। तब
मुनि ने उनको [विश्राम करने के लिये] सुन्दर स्थान बतला दिये॥२॥
बालमीकि मन आनंदु भारी।
मंगल मूरति नयन निहारी॥
तब कर कमल जोरि रघुराई।
बोले बचन श्रवन सुखदाई।
मंगल मूरति नयन निहारी॥
तब कर कमल जोरि रघुराई।
बोले बचन श्रवन सुखदाई।
[मुनि श्रीरामजी के पास बैठे हैं और उनकी] मङ्गल-मूर्ति को नेत्रों से देखकर
वाल्मीकिजी के मन में बड़ा भारी आनन्द हो रहा है। तब श्रीरघुनाथजी कमलसदृश
हाथों को जोड़कर, कानों को सुख देनेवाले मधुर वचन बोले-॥३॥
तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा।
बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा॥
अस कहि प्रभु सब कथा बखानी।
जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी॥
बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा॥
अस कहि प्रभु सब कथा बखानी।
जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी॥
हे मुनिनाथ! आप त्रिकालदर्शी हैं। सम्पूर्ण विश्व आपके लिये हथेली पर रखे हुए
बेर के समान है। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने ऐसा कहकर फिर जिस-जिस प्रकार से रानी
कैकेयी ने वनवास दिया, वह सब कथा विस्तार से सुनायी॥४॥
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