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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।
मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ॥१२५॥
मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ॥१२५॥
[और कहा-] हे प्रभो! पिता की आज्ञा [का पालन], माता का हित और भरत जैसे [स्नेही
एवं धर्मात्मा] भाई का राजा होना और फिर मुझे आपके दर्शन होना, यह सब मेरे
पुण्यों का प्रभाव है।।१२५॥
देखि पाय मुनिराय तुम्हारे।
भए सुकृत सब सुफल हमारे॥
अब जहँ राउर आयसु होई।
मुनि उदबेगु न पावै कोई॥
भए सुकृत सब सुफल हमारे॥
अब जहँ राउर आयसु होई।
मुनि उदबेगु न पावै कोई॥
हे मुनिराज! आपके चरणों का दर्शन करने से आज हमारे सब पुण्य सफल हो गये (हमें
सारे पुण्यों का फल मिल गया)। अब जहाँ आपकी आज्ञा हो और जहाँ कोई भी मुनि
उद्वेग को प्राप्त न हो-॥१॥
मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं।
ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥
मंगल मूल बिप्र परितोषू।
दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू॥
ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥
मंगल मूल बिप्र परितोषू।
दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू॥
क्योंकि जिनसे मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा बिना अग्नि के ही (अपने
दुष्ट कर्मों से ही) जलकर भस्म हो जाते हैं। ब्राह्मणों का संतोष सब मङ्गलों की
जड़ है और भूदेव ब्राह्मणों का क्रोध करोड़ों कुलोंको भस्म कर देता है॥२॥
अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ।
सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।
तहँ रचि रुचिर परन तृन साला।
बासु करौं कछु काल कृपाला॥
सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।
तहँ रचि रुचिर परन तृन साला।
बासु करौं कछु काल कृपाला॥
ऐसा हृदयमें समझकर वह स्थान बतलाइये जहाँ मैं लक्ष्मण और सीतासहित जाऊँ। और
वहाँ सुन्दर पत्तों और घासकी कुटी बनाकर, हे दयालु! कुछ समय निवास करूँ॥३॥
सहज सरल सुनि रघुबर बानी।
साधु साधु बोले मुनि ग्यानी।
कस न कहहु अस रघुकुलकेतू।
तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू॥
साधु साधु बोले मुनि ग्यानी।
कस न कहहु अस रघुकुलकेतू।
तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू॥
श्रीरामजी की सहज ही सरल वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि वाल्मीकि बोले-धन्य! धन्य! हे
रघुकुलके ध्वजास्वरूप! आप ऐसा क्यों न कहेंगे? आप सदैव वेदकी मर्यादाका पालन
(रक्षण) करते हैं।। ४॥
छं०- श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की।
जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।
सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी॥
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की।
जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।
सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी॥
हे राम! आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी [आपकी स्वरूपभूता]
माया हैं, जो कृपा के भण्डार आपकी रुख पाकर जगत्का सृजन, पालन और संहार करती
हैं। जो हजार मस्तक वाले सर्पो के स्वामी और पृथ्वी को अपने सिरपर धारण
करनेवाले हैं, वही चराचरके स्वामी शेषजी लक्ष्मण हैं। देवताओं के कार्यके लिये
आप राजाका शरीर धारण करके दुष्ट राक्षसोंकी सेनाका नाश करनेके लिये चले हैं।
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