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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- काने खोरे कूबरे, कुटिल कुचाली जानि।
तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि, भरतमातु मुसुकानि॥१४॥
तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि, भरतमातु मुसुकानि॥१४॥
कानों, लँगड़ों और कुबड़ोंको कुटिल और कुचाली जानना चाहिये।
उनमें भी स्त्री और खासकर दासी! इतना कहकर भरतजीकी माता कैकेयी मुसकरा दी॥१४॥
प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही।
सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही॥
सुदिनु सुमंगल दायकु सोई।
तोर कहा फुर जेहि दिन होई॥
सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही॥
सुदिनु सुमंगल दायकु सोई।
तोर कहा फुर जेहि दिन होई॥
[और फिर बोली-] हे प्रिय वचन कहनेवाली मन्थरा! मैंने तुझको यह
सीख दी है (शिक्षाके लिये इतनी बात कही है)। मुझे तुझ पर स्वप्न में भी क्रोध
नहीं है। सुन्दर मङ्गलदायक शुभ दिन वही होगा जिस दिन तेरा कहना सत्य होगा
(अर्थात् श्रीराम का राज्यतिलक होगा)॥१॥
जेठ स्वामि सेवक लघु भाई।
यह दिनकर कुल रीति सुहाई॥
राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली।
देउँ मागु मन भावत आली।
यह दिनकर कुल रीति सुहाई॥
राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली।
देउँ मागु मन भावत आली।
बड़ा भाई स्वामी और छोटा भाई सेवक होता है। यह सूर्यवंश की
सुहावनी रीति ही है। यदि सचमुच कल ही श्रीराम का तिलक है, तो हे सखी! तेरे मन
को अच्छी लगे वही वस्तु माँग ले, मैं दूंगी॥२॥
कौसल्या सम सब महतारी।
रामहि सहज सुभायँ पिआरी॥
मो पर करहिं सनेहु बिसेषी।
मैं करि प्रीति परीछा देखी॥
रामहि सहज सुभायँ पिआरी॥
मो पर करहिं सनेहु बिसेषी।
मैं करि प्रीति परीछा देखी॥
रामको सहज स्वभावसे सब माताएँ कौसल्याके समान ही प्यारी हैं।
मुझपर तो वे विशेष प्रेम करते हैं। मैंने उनकी प्रीतिकी परीक्षा करके देख ली
है॥३॥
जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू।
होहुँ राम सिय पूत पुतोहू॥
प्रान ते अधिक रामु प्रिय मोरें।
तिन्ह के तिलक छोभु कस तोरें॥
होहुँ राम सिय पूत पुतोहू॥
प्रान ते अधिक रामु प्रिय मोरें।
तिन्ह के तिलक छोभु कस तोरें॥
जो विधाता कृपा करके जन्म दें तो [यह भी दें कि] श्रीरामचन्द्र
पुत्र और सीता बहू हों। श्रीराम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। उनके
तिलक से (उनके तिलक की बात सुनकर) तुझे क्षोभ कैसा?॥ ४॥
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