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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- भरत सपथ तोहि सत्य कहु, परिहरि कपट दुराउ।
हरष समय बिसमउ करसि, कारन मोहि सुनाउ॥१५॥
हरष समय बिसमउ करसि, कारन मोहि सुनाउ॥१५॥
तुझे भरत की सौगन्ध है, छल-कपट छोड़कर सच-सच कह। तू हर्ष के समय
विषाद कर रही है, मुझे इसका कारण सुना॥ १५॥
एकहिं बार आस सब पूजी।
अब कछु कहब जीभ करि दूजी।
फोरै जोगु कपारु अभागा।
भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा॥
अब कछु कहब जीभ करि दूजी।
फोरै जोगु कपारु अभागा।
भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा॥
[मन्थराने कहा-] सारी आशाएँ तो एक ही बार कहने में पूरी
हो गयीं। अब तो दूसरी जीभ लगाकर कुछ कहूँगी। मेरा अभागा कपाल तो फोड़ने ही
योग्य है, जो अच्छी बात कहने पर भी आपको दुःख होता है॥१॥
कहहिं झूठि फुरि बात बनाई।
ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई॥
हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती।
नाहिं त मौन रहब दिनु राती॥
ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई॥
हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती।
नाहिं त मौन रहब दिनु राती॥
जो झूठी-सच्ची बातें बनाकर कहते हैं, हे माई! वे ही तुम्हें
प्रिय हैं और मैं कड़वी लगती हूँ ! अब मैं भी ठकुरसुहाती (मुँहदेखी) कहा
करूँगी। नहीं तो दिन रात चुप रहूँगी॥२॥
करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा।
बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा॥
कोउ नृप होउ हमहि का हानी।
चेरि छाड़ि अब होब कि रानी॥
बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा॥
कोउ नृप होउ हमहि का हानी।
चेरि छाड़ि अब होब कि रानी॥
विधाता ने कुरूप बनाकर मुझे परवश कर दिया! [दूसरे को क्या दोष]
जो बोया सो काटती हूँ, दिया सो पाती हूँ। कोई भी राजा हो, हमारी क्या हानि है
? दासी छोड़कर क्या अब मैं रानी होऊँगी! (अर्थात् रानी तो होने से रही)॥३॥
जारै जोगु सुभाउ हमारा।
अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।
तातें कछुक बात अनुसारी।
छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी॥
अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।
तातें कछुक बात अनुसारी।
छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी॥
हमारा स्वभाव तो जलाने ही योग्य है। क्योंकि तुम्हारा अहित
मुझसे देखा नहीं जाता। इसीलिये कुछ बात चलायी थी। किन्तु हे देवि! हमारी बड़ी
भूल हुई, क्षमा करो॥ ४॥
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