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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- नहिं तृन चरहिं न पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि।
ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि॥१४२॥
ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि॥१४२॥
वे न तो घास चरते हैं,न पानी पीते हैं। केवल आँखों से जल बहा रहे हैं।
श्रीरामचन्द्रजी के घोड़ों को इस दशा में देखकर सब निषाद व्याकुल हो गये॥१४२॥
धरि धीरजु तब कहइ निषादू।
अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू॥
तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता।
धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता॥
अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू॥
तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता।
धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता॥
तब धीरज धरकर निषादराज कहने लगा-हे सुमन्त्रजी! अब विषाद को छोड़िये। आप पण्डित
और परमार्थके जाननेवाले हैं। विधाताको प्रतिकूल जानकर धैर्य धारण कीजिये॥१॥
बिबिधि कथा कहि कहि मृदु बानी।
रथ बैठारेउ बरबस आनी॥
सोक सिथिल रथु सकइ न हाँकी।
रघुबर बिरह पीर उर बाँ
की॥
रथ बैठारेउ बरबस आनी॥
सोक सिथिल रथु सकइ न हाँकी।
रघुबर बिरह पीर उर बाँ
की॥
कोमल वाणी से भाँति-भाँति की कथाएँ कहकर निषाद ने जबर्दस्ती लाकर सुमन्त्रको
रथपर बैठाया। परन्तु शोक के मारे वे इतने शिथिल हो गये कि रथ को हाँक नहीं
सकते। उनके हृदयमें श्रीरामचन्द्रजीके विरहकी बड़ी तीव्र वेदना है॥२॥
चरफराहिं मग चलहिं न घोरे।
बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे॥
अढ़कि परहिं फिरि हेरहिं पीछे।
राम बियोगि बिकल दुख तीछे।
बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे॥
अढ़कि परहिं फिरि हेरहिं पीछे।
राम बियोगि बिकल दुख तीछे।
घोड़े तड़फड़ाते हैं और [ठीक] रास्ते पर नहीं चलते। मानो जंगली पशु लाकर रथ में
जोत दिये गये हों। वे श्रीरामचन्द्रजी के वियोगी घोड़े कभी ठोकर खाकर गिर पड़ते
हैं, कभी घूमकर पीछे की ओर देखने लगते हैं। वे तीक्ष्ण दुःखसे व्याकुल हैं॥ ३॥
जो कह रामु लखनु बैदेही।
हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही।
बाजि बिरह गति कहि किमि जाती।
बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती॥
हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही।
बाजि बिरह गति कहि किमि जाती।
बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती॥
जो कोई राम, लक्ष्मण या जानकी का नाम ले लेता है, घोड़े हिकर-हिकरकर उसकी ओर
प्यार से देखने लगते हैं। घोड़ों की विरह दशा कैसे कही जा सकती है?
वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे मणिके बिना साँप व्याकुल होता है॥४॥
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