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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- भयउ निषादु बिषादबस देखत सचिव तुरंग।
बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग॥१४३॥
बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग॥१४३॥
मन्त्री और घोड़ोंकी यह दशा देखकर निषादराज विषादके वश हो गया। तब उसने अपने
चार उत्तम सेवक बुलाकर सारथीके साथ कर दिये॥१४३।।।
गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई।
बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई॥
चले अवध लेइ रथहि निषादा।
होहिं छनहिं छन मगन बिषादा॥
बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई॥
चले अवध लेइ रथहि निषादा।
होहिं छनहिं छन मगन बिषादा॥
निषादराज गुह सारथी (सुमन्त्रजी) को पहुँचाकर (विदा करके) लौटा। उसके विरह और
दुःखका वर्णन नहीं किया जा सकता। वे चारों निषाद रथ लेकर अवधको चले। [सुमन्त्र
और घोड़ोंको देख-देखकर] वे भी क्षण-क्षणभर विषादमें डूबे जाते थे॥१॥
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