|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०-- बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति।
जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति॥१४४॥
जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति॥१४४॥
जैसे कोई विवेकशील, वेदका ज्ञाता, साधुसम्मत आचरणों वाला और उत्तम जाति का
(कुलीन) ब्राह्मण धोखे से मदिरा पी ले और पीछे पछतावे, उसी प्रकार मन्त्री
सुमन्त्र सोच कर रहे (पछता रहे) हैं॥ १४४॥
जिमि कुलीन तिय साधु सयानी।
पतिदेवता करम मन बानी॥
रहै करम बस परिहरि नाहू।
सचिव हृदय तिमि दारुन दाहू॥
पतिदेवता करम मन बानी॥
रहै करम बस परिहरि नाहू।
सचिव हृदय तिमि दारुन दाहू॥
जैसे किसी उत्तम कुल वाली, साधु स्वभाव की, समझदार और मन,वचन,कर्म से पति को ही
देवता मानने वाली पतिव्रता स्त्री को भाग्यवश पति को छोड़कर (पति से अलग) रहना
पड़े, उस समय उसके हृदय में जैसे भयानक सन्ताप होता है, वैसे ही मन्त्री के
हृदय में हो रहा है॥१॥
लोचन सजल डीठि भइ थोरी।
सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी॥
सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी।
जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी॥
सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी॥
सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी।
जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी॥
नेत्रों में जल भरा है, दृष्टि मन्द हो गयी है। कानों से सुनायी नहीं पडता,
व्याकुल हुई बुद्धि बेठिकाने हो रही है। ओठ सूख रहे हैं, मुँह में लाटी लग गयी
है। किन्तु [ये सब मृत्युके लक्षण हो जानेपर भी] प्राण नहीं निकलते; क्योंकि
हृदयमें अवधिरूपी किवाड़ लगे हैं (अर्थात् चौदह वर्ष बीत जानेपर भगवान् फिर
मिलेंगे, यही आशा रुकावट डाल रही है)॥२॥
बिबरन भयउ न जाइ निहारी।
मारेसि मनहुँ पिता महतारी॥
हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी।
जमपुर पंथ सोच जिमि पापी॥
मारेसि मनहुँ पिता महतारी॥
हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी।
जमपुर पंथ सोच जिमि पापी॥
सुमन्त्रजीके मुखका रंग बदल गया है, जो देखा नहीं जाता। ऐसा मालूम होता है मानो
इन्होंने माता-पिताको मार डाला हो। उनके मनमें रामवियोगरूपी हानिकी महान्
ग्लानि (पीड़ा) छा रही है, जैसे कोई पापी मनुष्य नरकको जाता हुआ रास्तेमें सोच
कर रहा हो॥३॥
बचनु न आव हृदय पछिताई।
अवध काह मैं देखब जाई॥
राम रहित रथ देखिहि जोई।
सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई॥
अवध काह मैं देखब जाई॥
राम रहित रथ देखिहि जोई।
सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई॥
मुँहसे वचन नहीं निकलते। हृदयमें पछताते हैं कि मैं अयोध्यामें जाकर क्या
देखूगा? श्रीरामचन्द्रजीसे शून्य रथको जो भी देखेगा, वही मुझे देखनेमें संकोच
करेगा (अर्थात् मेरा मुँह नहीं देखना चाहेगा)॥४॥
|
|||||
लोगों की राय
No reviews for this book






