रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।
उतरु देब मैं सबहि तब हृदय बजे बैठारि॥१४५॥


नगरके सब व्याकुल स्त्री-पुरुष जब दौड़कर मुझसे पूछेगे, तब मैं हृदयपर वज्र रखकर सबको उत्तर दूंगा।। १४५॥

पुछिहहिं दीन दुखित सब माता।
कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता॥
पूछिहि जबहिं लखन महतारी।
कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी॥


जब दीन-दुःखी सब माताएँ पूछेगी, तब हे विधाता! मैं उन्हें क्या कहूँगा? जब लक्ष्मणजीकी माता मुझसे पूछेगी, तब मैं उन्हें कौन-सा सुखदायी सँदेसा कहूँगा?॥१॥

राम जननि जब आइहि धाई।
सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई।
पूँछत उतरु देब मैं तेही।
गे बनु राम लखनु बैदेही॥


श्रीरामजीकी माता जब इस प्रकार दौड़ी आवेंगी जैसे नयी ब्यायी हुई गौ बछड़ेको याद करके दौड़ी आती है, तब उनके पूछनेपर मैं उन्हें यह उत्तर दूंगा कि श्रीराम, लक्ष्मण, सीता वनको चले गये!॥२॥

जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा।
जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा॥
पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना।
जिवनु जासु रघुनाथ अधीना॥


जो भी पूछेगा उसे यही उत्तर देना पड़ेगा! हाय! अयोध्या जाकर अब मुझे यही सुख लेना है! जब दुःखसे दीन महाराज, जिनका जीवन श्रीरघुनाथजीके [दर्शनके] ही अधीन है, मुझसे पूछेगे,॥३॥

देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई।
आयउँ कुसल कुर पहुँचाई॥
सुनत लखन सिय राम सँदेसू।
तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू॥


तब मैं कौन-सा मुँह लेकर उन्हें उत्तर दूंगा कि मैं राजकुमारों को कुशलपूर्वक पहुँचा आया हूँ! लक्ष्मण, सीता और श्रीरामका समाचार सुनते ही महाराज तिनके की तरह शरीर को त्याग देंगे॥ ४॥

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