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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ।
नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ॥१४९।।
नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ॥१४९।।
हे सखा! श्रीराम, जानकी और लक्ष्मण जहाँ हैं, मुझे भी वहीं पहुँचा दो। नहीं तो
मैं सत्य भावसे कहता हूँ कि मेरे प्राण अब चलना ही चाहते हैं। १४९॥
पुनि पुनि पूँछत मंत्रिहि राऊ।
प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ॥
करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ।
रामु लखनु सिय नयन देखाऊ॥
प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ॥
करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ।
रामु लखनु सिय नयन देखाऊ॥
राजा बार-बार मन्त्री से पूछते हैं--मेरे प्रियतम पुत्रों का सँदेसा सुनाओ। हे
सखा ! तुम तुरंत वही उपाय करो जिससे श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को मुझे आँखों
दिखा दो॥१॥
सचिव धीर धरि कह मृदु बानी।
महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी॥
बीर सुधीर धुरंधर देवा।
साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा।
महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी॥
बीर सुधीर धुरंधर देवा।
साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा।
मन्त्री धीरज धरकर कोमल वाणी बोले-महाराज! आप पण्डित और ज्ञानी हैं। हे देव! आप
शूरवीर तथा उत्तम धैर्यवान् पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं। आपने सदा साधुओंके समाजका
सेवन किया है॥२॥
जनम मरन सब दुख सुख भोगा।
हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा।
काल करम बस होहिं गोसाईं।
बरबस राति दिवस की नाईं।
हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा।
काल करम बस होहिं गोसाईं।
बरबस राति दिवस की नाईं।
जन्म-मरण, सुख-दुःखके भोग, हानि-लाभ, प्यारोंका मिलना-बिछुड़ना, ये सब हे
स्वामी! काल और कर्मके अधीन रात और दिनकी तरह बरबस होते रहते हैं॥३॥
सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं।
दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं॥
धीरज धरहु बिबेकु बिचारी।
छाड़िअ सोच सकल हितकारी॥
दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं॥
धीरज धरहु बिबेकु बिचारी।
छाड़िअ सोच सकल हितकारी॥
मूर्ख लोग सुख में हर्षित होते और दुःख में रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मन में
दोनों को समान समझते हैं। हे सबके हितकारी (रक्षक)! आप विवेक विचारकर धीरज
धरिये और शोक का परित्याग कीजिये॥४॥
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