रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- देखि सचिव जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु।
सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु॥१४८॥


मन्त्रीने देखकर 'जयजीव' कहकर दण्डवत्-प्रणाम किया। सुनते ही राजा व्याकुल होकर उठे और बोले-सुमन्त्र! कहो, राम कहाँ हैं ?॥ १४८॥

भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई।
बूड़त कछु अधार जनु पाई।
सहित सनेह निकट बैठारी।
पूँछत राउ नयन भरि बारी॥


राजा ने सुमन्त्र को हृदय से लगा लिया। मानो डूबते हुए आदमी को कुछ सहारा मिल गया हो। मन्त्री को स्नेह के साथ पास बैठाकर नेत्रों में जल भरकर राजा पूछने लगे-॥१॥

राम कुसल कहु सखा सनेही।
कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही॥
आने फेरि कि बनहि सिधाए।
सुनत सचिव लोचन जल छाए॥


हे मेरे प्रेमी सखा! श्रीरामकी कुशल कहो। बताओ, श्रीराम,लक्ष्मण और जानकी कहाँ हैं? उन्हें लौटा लाये हो कि वे वनको चले गये? यह सुनते ही मन्त्रीके नेत्रोंमें जल भर आया॥२॥

सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू।
कहु सिय राम लखन संदेसू॥
राम रूप गुन सील सुभाऊ।
सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ॥


शोकसे व्याकुल होकर राजा फिर पूछने लगे---सीता, राम और लक्ष्मण का सँदेसा तो कहो। श्रीरामचन्द्रजीके रूप, गुण, शील और स्वभावको याद कर-करके राजा हृदयमें सोच करते हैं॥३॥

राउ सुनाई दीन्ह बनबासू।
सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू॥
सो सुत बिछुरत गए न प्राना।
को पापी बड़ मोहि समाना।


[और कहते हैं--] मैंने राजा होनेकी बात सुनाकर वनवास दे दिया, यह सुनकर भी जिस (राम) के मनमें हर्ष और विषाद नहीं हुआ, ऐसे पुत्रके बिछुड़नेपर भी मेरे प्राण नहीं गये, तब मेरे समान बड़ा पापी कौन होगा?॥४॥

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