रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

सो०- गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि।
करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति॥१५१॥


बार-बार चरणकमलों को पकड़कर गुरु वसिष्ठजी से मेरा सँदेसा कहना कि वे वही उपदेश दें जिससे अवधपति पिताजी मेरा सोच न करें। १५१॥

पुरजन परिजन सकल निहोरी।
तात सुनाएहु बिनती मोरी॥
सोइ सब भाँति मोर हितकारी।
जातें रह नरनाहु सुखारी॥


हे तात! सब पुरवासियों और कुटुम्बियोंसे निहोरा (अनुरोध) करके मेरी विनती सुनाना कि वही मनुष्य मेरा सब प्रकारसे हितकारी है जिसकी चेष्टासे महाराज सुखी रहें॥१॥

कहब सँदेसु भरत के आएँ।
नीति न तजिअ राजपदु पाएँ।
पालेहु प्रजहि करम मन बानी।
सेएहु मातु सकल सम जानी॥


भरत के आने पर उनको मेरा सँदेसा कहना कि राजा का पद पा जाने पर नीति न छोड़ देना; कर्म, वचन और मनसे प्रजा का पालन करना और सब माताओं को समान जानकर उनकी सेवा करना॥२॥

ओर निबाहेहु भायप भाई।
करि पितु मातु सुजन सेवकाई॥
तात भाँति तेहि राखब राऊ।
सोच मोर जेहिं करै न काऊ॥


और हे भाई! पिता, माता और स्वजनों की सेवा करके भाईपने को अन्त तक निबाहना। हे तात! राजा (पिताजी) को उसी प्रकारसे रखना जिससे वे कभी (किसी तरह भी) मेरा सोच न करें॥३॥

लखन कहे कछु बचन कठोरा।
बरजि राम पुनि मोहि निहोरा॥
बार बार निज सपथ देवाई।
कहबि न तात लखन लरिकाई॥


लक्ष्मणजीने कुछ कठोर वचन कहे। किन्तु श्रीरामजीने उन्हें बरजकर फिर मुझसे अनुरोध किया और बार-बार अपनी सौगंध दिलायी [और कहा-] हे तात! लक्ष्मणका लड़कपन वहाँ न कहना॥४॥

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