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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- कहि प्रनामु कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह।
थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह॥१५२॥
थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह॥१५२॥
प्रणामकर सीताजी भी कुछ कहने लगी थीं, परन्तु स्नेहवश वे शिथिल हो गयीं। उनकी
वाणी रुक गयी, नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर रोमाञ्चसे व्याप्त हो गया॥१५२॥
तेहि अवसर रघुबर रुख पाई।
केवट पारहि नाव चलाई॥
रघुकुलतिलक चले एहि भाँती।
देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती॥
केवट पारहि नाव चलाई॥
रघुकुलतिलक चले एहि भाँती।
देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती॥
उसी समय श्रीरामचन्द्रजी का रुख पाकर केवट ने पार जानेके लिये नाव चला दी। इस
प्रकार रघुवंशतिलक श्रीरामचन्द्रजी चल दिये और मैं छातीपर वज्र रखकर खड़ा खड़ा
देखता रहा॥१॥
मैं आपन किमि कहौं कलेसू।
जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू॥
अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ।
हानि गलानि सोच बस भयऊ।
जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू॥
अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ।
हानि गलानि सोच बस भयऊ।
मैं अपने क्लेश को कैसे कहूँ, जो श्रीरामजी का यह सँदेसा लेकर जीता ही लौट आया!
ऐसा कहकर मन्त्री की वाणी रुक गयी (वे चुप हो गये) और वे हानि की ग्लानि और सोच
के वश हो गये॥२॥
सूत बचन सुनतहिं नरनाहू।
परेउ धरनि उर दारुन दाहू॥
तलफत बिषम मोह मन मापा।
माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा॥
परेउ धरनि उर दारुन दाहू॥
तलफत बिषम मोह मन मापा।
माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा॥
सारथी सुमन्त्र के वचन सुनते ही राजा पृथ्वीपर गिर पड़े, उनके हृदय में भयानक
जलन होने लगी। वे तड़पने लगे, उनका मन भीषण मोह से व्याकुल हो गया। मानो मछली
को माँजा व्याप गया हो (पहली वर्षाका जल लग गया हो)॥३॥
करि बिलाप सब रोवहिं रानी।
महा बिपति किमि जाइ बखानी॥
सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा।
धीरजहू कर धीरजु भागा॥
महा बिपति किमि जाइ बखानी॥
सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा।
धीरजहू कर धीरजु भागा॥
सब रानियाँ विलाप करके रो रही हैं। उस महान् विपत्तिका कैसे वर्णन किया जाय? उस
समयके विलापको सुनकर दुःखको भी दुःख लगा और धीरजका भी धीरज भाग गया!॥४॥
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