रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम॥
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम॥१५५॥


राम-राम कहकर, फिर राम कहकर, फिर राम-राम कहकर और फिर राम कहकर राजा श्रीराम के विरह में शरीर त्याग कर सुरलोक को सिधार गये॥१५५॥

जिअन मरन फलु दसरथ पावा।
अंड अनेक अमल जसु छावा॥
जिअत राम बिधु बदनु निहारा।
राम बिरह करि मरनु सँवारा॥


जीने और मरनेका फल तो दशरथजीने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनेकों ब्रह्माण्डोंमें छा गया। जीते-जी तो श्रीरामचन्द्रजीके चन्द्रमाके समान मुखको देखा और श्रीरामके विरहको निमित्त बनाकर अपना मरण सुधार लिया॥१॥

सोक बिकल सब रोवहिं रानी।
रूपु सीलु बलु तेजु बखानी॥
करहिं बिलाप अनेक प्रकारा।
परहिं भूमितल बारहिं बारा॥


सब रानियाँ शोक के मारे व्याकुल होकर रो रही हैं। वे राजा के रूप, शील, बल और तेजका बखान कर-करके अनेकों प्रकारसे विलाप कर रही हैं और बार-बार धरतीपर गिर-गिर पड़ती हैं।। २।।

बिलपहिं बिकल दास अरु दासी।
घर घर रुदनु करहिं पुरबासी॥
अँथयउ आजु भानुकुल भानू।
धरम अवधि गुन रूप निधानू॥


दास-दासीगण व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं और नगरनिवासी घर-घर रो रहे हैं। कहते हैं कि आज धर्मकी सीमा, गुण और रूपके भण्डार सूर्यकुलके सूर्य अस्त हो गये!॥३॥
गारी सकल कैकइहि देहीं।
नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं॥
एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी।
आए सकल महामुनि ग्यानी॥


सब कैकेयीको गालियाँ देते हैं, जिसने संसारभर को बिना नेत्र का (अंधा) कर दिया! इस प्रकार विलाप करते रात बीत गयी। प्रात:काल सब बड़े-बड़े ज्ञानी मुनि आये॥४॥

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