रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
आईएसबीएन :

Like this Hindi book 0

भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उधारि।
तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि॥१५४॥


प्रिय पत्नी कौसल्याके कोमल वचन सुनते हुए राजाने आँखें खोलकर देखा! मानो तड़पती हुई दीन मछलीपर कोई शीतल जल छिड़क रहा हो॥ १५४॥

धरि धीरजु उठि बैठ भुआलू।
कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू॥
कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही।
कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही।


धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले-सुमन्त्र! कहो, कृपालु श्रीराम कहाँ हैं? लक्ष्मण कहाँ हैं? स्नेही राम कहाँ हैं? और मेरी प्यारी बहू जानकी कहाँ है?॥१॥

बिलपत राउ बिकल बहु भाँती।
भइ जुग सरिस सिराति न राती॥
तापस अंध साप सुधि आई।
कौसल्यहि सब कथा सुनाई।


राजा व्याकुल होकर बहुत प्रकारसे विलाप कर रहे हैं। वह रात युगके समान बड़ी हो गयी, बीतती ही नहीं। राजाको अंधे तपस्वी (श्रवणकुमारके पिता) के शापकी याद आ गयी। उन्होंने सब कथा कौसल्याको कह सुनायी॥२॥

भयउ बिकल बरनत इतिहासा।
राम रहित धिग जीवन आसा॥
सो तनु राखि करब मैं काहा।
जेहिं न प्रेम पनु मोर निबाहा।।


उस इतिहास का वर्णन करते-करते राजा व्याकुल हो गये और कहने लगे कि श्रीराम के बिना जीने की आशा को धिक्कार है। मैं उस शरीर को रखकर क्या करूँगा जिसने मेरा प्रेमका प्रण नहीं निबाहा?॥३॥

हा रघुनंदन प्रान पिरीते।
तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते॥
हा जानकी लखन हा रघुबर।
हा पितु हित चित चातक जलधर॥


हा रघुकुल को आनन्द देने वाले मेरे प्राणप्यारे राम! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गये। हा जानकी, लक्ष्मण! हा रघुवर! हा पिता के चित्तरूपी चातक के हित करनेवाले मेघ!॥४॥

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

लोगों की राय

No reviews for this book