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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
मुनि वसिष्ठ का भरतजी को बुलाने के लिए दूत भेजना
तेल नावं भरि नृप तनु राखा।
दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा॥
धावहु बेगि भरत पहिं जाहू।
नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू॥
दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा॥
धावहु बेगि भरत पहिं जाहू।
नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू॥
वसिष्ठजीने नावमें तेल भरवाकर राजाके शरीरको उसमें रखवा दिया। फिर दूतोंको बुलवाकर उनसे ऐसा कहा-तुमलोग जल्दी दौड़कर भरतके पास जाओ। राजाकी मृत्युका समाचार कहीं किसीसे न कहना॥१॥
एतनेइ कहेहु भरत सन जाई।
गुर बोलाइ पठयउ दोउ भाई॥
सुनि मुनि आयसु धावन धाए।
चले बेग बर बाजि लजाए।
गुर बोलाइ पठयउ दोउ भाई॥
सुनि मुनि आयसु धावन धाए।
चले बेग बर बाजि लजाए।
जाकर भरत से इतनाही कहना कि दोनों भाइयों को गुरुजी ने बुलवा भेजा है। मुनि की आज्ञासुनकर धावन (दूत) दौड़े।वे अपने वेग से उत्तम घोड़ोंको भी लजाते हुए चले॥२॥
अनरथु अवध अरंभेउ जब तें।
कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें॥
देखहिं राति भयानक सपना।
जागि करहिं कटु कोटि कलपना॥
कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें॥
देखहिं राति भयानक सपना।
जागि करहिं कटु कोटि कलपना॥
जबसे अयोध्या में अनर्थ प्रारम्भ हुआ, तभी से भरतजी को अपशकुन होने लगे। वे रातको भयङ्कर स्वप्न देखते थे और जागनेपर [उन स्वप्नोंके कारण] करोड़ों (अनेकों) तरहकी बुरी-बुरी कल्पनाएँ किया करते थे॥३॥
बिप्र जेवाँइ देहि दिन दाना।
सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना॥
मागहिं हृदयँ महेस मनाई।
कुसल मातु पितु परिजन भाई॥
सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना॥
मागहिं हृदयँ महेस मनाई।
कुसल मातु पितु परिजन भाई॥
[अनिष्टशान्ति के लिये] वे प्रतिदिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देते थे। अनेकों विधियोंसे रुद्राभिषेक करते थे। महादेवजी को हृदयमें मनाकर उनसे माता-पिता, कुटुम्बी और भाइयोंका कुशल-क्षेम माँगते थे॥४॥
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