रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)

गोस्वामी तुलसीदास

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :0
मुखपृष्ठ :
पुस्तक क्रमांक : 10
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

दो०- एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।
गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ॥१५७॥

भरतजी इस प्रकार मनमें चिन्ता कर रहे थे कि दूत आ पहुँचे। गुरुजीकी आज्ञा कानोंसे सुनते ही वे गणेशजीको मनाकर चल पड़े॥१५७॥

चले समीर बेग हय हाँके।
नाघत सरित सैल बन बाँके।
हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई।
अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई।


हवाके समान वेगवाले घोड़ोंको हाँकते हुए वे विकट नदी, पहाड़ तथा जंगलोंको लाँघते हुए चले। उनके हृदयमें बड़ा सोच था, कुछ सुहाता न था। मनमें ऐसा सोचते थे कि उड़कर पहुँच जाऊँ॥१॥

एक निमेष बरष सम जाई।
एहि बिधि भरत नगर निअराई॥
असगुन होहिं नगर पैठारा।
रटहिं कुभाँति कुखेत करारा॥


एक-एक निमेष वर्षके समान बीत रहा था। इस प्रकार भरतजी नगरके निकट पहुँचे। नगरमें प्रवेश करते समय अपशकुन होने लगे। कौए बुरी जगह बैठकर बुरी तरहसे काँव-काँव कर रहे हैं॥२॥

खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला।
सुनि सुनि होइ भरत मन सूला॥
श्रीहत सर सरिता बन बागा।
नगरु बिसेषि भयावनु लागा॥


गदहे और सियार विपरीत बोल रहे हैं। यह सुन-सुनकर भरत के मन में बड़ी पीड़ा हो रही है। तालाब, नदी, वन, बगीचे सब शोभाहीन हो रहे हैं। नगर बहुत ही भयानक लग रहा है॥३॥

खग मृग हय गय जाहिं न जोए।
राम बियोग कुरोग बिगोए॥
नगर नारि नर निपट दुखारी।
मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी।


श्रीरामजी के वियोगरूपी बुरे रोग से सताये हुए पक्षी-पशु, घोड़े-हाथी [ऐसे दुःखी हो रहे हैं कि] देखे नहीं जाते। नगर के स्त्री-पुरुष अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। मानो सब अपनी सारी सम्पत्ति हार बैठे हों॥४॥

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