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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
भरत-कौसल्या-संवाद और दशरथ की अन्त्येष्टि क्रिया
दो०- सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन।
भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन॥१५९॥
भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन॥१५९॥
पुत्रके स्नेहमय वचन सुनकर नेत्रोंमें कपटका जल भरकर पापिनी कैकेयी भरतके
कानोंमें और मनमें शूलके समान चुभनेवाले वचन बोली-॥ १५९॥
तात बात मैं सकल सँवारी।
भै मंथरा सहाय बिचारी।
कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ।
भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ॥
भै मंथरा सहाय बिचारी।
कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ।
भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ॥
हे तात! मैंने सारी बात बना ली थी। बेचारी मन्थरा सहायक हुई। पर विधाताने
बीचमें जरा-सा काम बिगाड़ दिया। वह यह कि राजा देवलोकको पधार गये॥१॥
सुनत भरतु भए बिबस बिषादा।
जनु सहमेउ करि केहरि नादा॥
तात तात हा तात पुकारी।
परे भूमितल ब्याकुल भारी॥
जनु सहमेउ करि केहरि नादा॥
तात तात हा तात पुकारी।
परे भूमितल ब्याकुल भारी॥
भरत यह सुनते ही विषादके मारे विवश (बेहाल) हो गये। मानो सिंहकी गर्जना सुनकर
हाथी सहम गया हो। वे 'तात! तात! हा तात!' पुकारते हुए अत्यन्त व्याकुल होकर
जमीनपर गिर पड़े॥२॥
चलत न देखन पायउँ तोही।
तात न रामहि सौंपेहु मोही॥
बहुरि धीर धरि उठे सँभारी।
कहु पितु मरन हेतु महतारी॥
तात न रामहि सौंपेहु मोही॥
बहुरि धीर धरि उठे सँभारी।
कहु पितु मरन हेतु महतारी॥
[और विलाप करने लगे कि] हे तात! मैं आपको [स्वर्गके लिये] चलते समय देख भी न
सका। [हाय!] आप मुझे श्रीरामजीको सौंप भी नहीं गये! फिर धीरज धरकर वे सँभलकर
उठे और बोले-माता! पिताके मरनेका कारण तो बताओ॥३॥
सुनि सुत बचन कहति कैकेई।
मरमु पाँछि जनु माहुर देई॥
आदिहु तें सब आपनि करनी।
कुटिल कठोर मुदित मन बरनी॥
मरमु पाँछि जनु माहुर देई॥
आदिहु तें सब आपनि करनी।
कुटिल कठोर मुदित मन बरनी॥
पुत्रका वचन सुनकर कैकेयी कहने लगी। मानो मर्मस्थान को पाछकर (चाकूसे चीरकर)
उसमें जहर भर रही हो। कुटिल और कठोर कैकेयी ने अपनी सब करनी शुरूसे [आखीर तक
बड़े] प्रसन्न मनसे सुना दी॥४॥
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