|
रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
|
|
||||||
भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।
हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु॥१६०॥
हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु॥१६०॥
श्रीरामचन्द्रजी का वन जाना सुनकर भरतजी को पिता का मरण भूल गया और हृदय में इस
सारे अनर्थ का कारण अपने को ही जानकर वे मौन होकर स्तम्भित रह गये (अर्थात्
उनकी बोली बंद हो गयी और वे सन्न रह गये)॥१६०॥
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति।
मनहुँ जरे पर लोनु लगावति॥
तात राउ नहिं सोचै जोगू।
बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू॥
मनहुँ जरे पर लोनु लगावति॥
तात राउ नहिं सोचै जोगू।
बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू॥
पुत्र को व्याकुल देखकर कैकेयी समझाने लगी। मानो जले पर नमक लगा रही हो। [वह
बोली-] हे तात! राजा सोच करने योग्य नहीं हैं। उन्होंने पुण्य और यश कमाकर उसका
पर्याप्त भोग किया॥१॥
जीवत सकल जनम फल पाए।
अंत अमरपति सदन सिधाए॥
अस अनुमानि सोच परिहरहू।
सहित समाज राज पुर करहू॥
अंत अमरपति सदन सिधाए॥
अस अनुमानि सोच परिहरहू।
सहित समाज राज पुर करहू॥
जीवनकालमें ही उन्होंने जन्म लेनेके सम्पूर्ण फल पा लिये और अन्तमें वे
इन्द्रलोकको चले गये। ऐसा विचारकर सोच छोड़ दो और समाजसहित नगरका राज्य करो॥२॥
सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू।
पाकें छत जनु लाग अँगारू॥
धीरज धरि भरि लेहिं उसासा।
पापिनि सबहि भाँति कुल नासा॥
पाकें छत जनु लाग अँगारू॥
धीरज धरि भरि लेहिं उसासा।
पापिनि सबहि भाँति कुल नासा॥
राजकुमार भरतजी यह सुनकर बहुत ही सहम गये। मानो पके घाव पर अंगार छू गया हो।
उन्होंने धीरज धरकर बड़ी लंबी साँस लेते हुए कहा-पापिनी! तूने सभी तरहसे कुलका
नाश कर दिया॥३॥
जौं पै कुरुचि रही अति तोही।
जनमत काहे न मारे मोही॥
पेड़ काटि तैं पालउ सींचा।
मीन जिअन निति बारि उलीचा॥
जनमत काहे न मारे मोही॥
पेड़ काटि तैं पालउ सींचा।
मीन जिअन निति बारि उलीचा॥
हाय! यदि तेरी ऐसी ही अत्यन्त बुरी रुचि (दुष्ट इच्छा) थी, तो तूने जन्मते ही
मुझे मार क्यों नहीं डाला? तूने पेड़को काटकर पत्तेको सींचा है और मछलीके
जीनेके लिये पानीको उलीच डाला! (अर्थात् मेरा हित करने जाकर उलटा तूने मेरा
अहित कर डाला)॥४॥
|
|||||
लोगों की राय
No reviews for this book






