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रामायण >> श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड) श्रीरामचरितमानस अर्थात तुलसी रामायण (अयोध्याकाण्ड)गोस्वामी तुलसीदास
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भारत की सर्वाधिक प्रचलित रामायण। द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड
दो०- राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि॥१६२॥
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि॥१६२॥
विधाता ने मुझे श्रीरामजी से विरोध करने वाले (तेरे) हृदय से उत्पन्न किया
[अथवा विधाताने मुझे हृदयसे रामका विरोधी जाहिर कर दिया]। मेरे बराबर पापी
दूसरा कौन है? मैं व्यर्थ ही तुझे कुछ कहता हूँ॥१६२॥
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई।
जरहिं गात रिस कछु न बसाई॥
तेहि अवसर कुबरी तहँ आई।
बसन बिभूषन बिबिध बनाई।
जरहिं गात रिस कछु न बसाई॥
तेहि अवसर कुबरी तहँ आई।
बसन बिभूषन बिबिध बनाई।
माताकी कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नजीके सब अङ्ग क्रोधसे जल रहे हैं, पर कुछ वश नहीं
चलता। उसी समय भाँति-भाँतिके कपड़ों और गहनोंसे सजकर कुबरी (मन्थरा) वहाँ
आयी॥१॥
लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई।
बरत अनल घृत आहुति पाई।
हुमगि लात तकि कूबर मारा।
परि मुह भर महि करत पुकारा॥
बरत अनल घृत आहुति पाई।
हुमगि लात तकि कूबर मारा।
परि मुह भर महि करत पुकारा॥
उसे [सजी] देखकर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नजी क्रोध में भर गये। मानो जलती
हुई आग को घी की आहुति मिल गयी हो। उन्होंने जोर से तक कर कूबड़ पर एक लात जमा
दी। वह चिल्लाती हुई मुँह के बल जमीनपर गिर पड़ी॥२॥
कूबर टूटेउ फूट कपारू।
दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू॥
आह दइअ मैं काह नसावा।
करत नीक फलु अनइस पावा।।
दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू॥
आह दइअ मैं काह नसावा।
करत नीक फलु अनइस पावा।।
उसका कूबड़ टूट गया, कपाल फूट गया, दाँत टूट गये और मुँह से खून बहने लगा। [वह
कराहती हुई बोली-] हाय दैव! मैंने क्या बिगाड़ा? जो भला करते बुरा फल पाया॥३॥
सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी।
लगे घसीटन धरि धरि झोंटी॥
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई।
कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।
लगे घसीटन धरि धरि झोंटी॥
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई।
कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।
उसकी यह बात सुनकर और उसे नखसे शिखातक दुष्ट जानकर शत्रुघ्नजी झोंटा
पकड़-पकड़कर उसे घसीटने लगे। तब दयानिधि भरतजी ने उसको छुड़ा दिया और दोनों भाई
[तुरंत] कौसल्याजी के पास गये॥४॥
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